Manas Evam Gita Ka Tulnatmak Vivechan – 1

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Manas Evam Gita Ka Tulnatmak Vivechan – 1

Manas Evam Gita Ka Tulnatmak Vivechan – 1

170.00 169.00

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Author: Sriramkinkar Ji Maharaj

Availability: 4 in stock

Pages: 172

Year: 2014

Binding: Paperback

ISBN: 0

Language: Hindi

Publisher: Ramayanam Trust

Description

मानस एवं गीता का तुलनात्मक विवेचन – 1

भूमिका

भूमिका प्रारम्भ करते समय एक सम्मेलन की स्मृतियाँ मुखर हो उठी हैं। देश-विदेश के अनेक विद्वान और विचारक मञ्च पर उपस्थित थे। उन्होंने जो विचार प्रस्तुत किये, उनमें भिन्नता हो यह स्वाभाविक ही है। श्रोता विविध रसों के रूप में उनका आस्वादन करते हुए आनन्दित हो रहे थे। कुछ भाषणों में कटु-तिक्त का आधिक्य था तो कुछ में मधुरता के बोल थे। फिर भी ऐसा लगा कि कटु-तिक्त अधिक मुखर हो उठा है। उसमें आलोचना थी, प्रश्नचिह्न थे और नैराश्य की अभिव्यक्ति थी। उसमें बढ़ते हुए भ्रष्टाचार पर चिन्ता थी। वे बातें उपयोगी और युक्ति संगत थीं। फिर भी मुझे लगा कि जीवन को देखने की यह दृष्टि अधूरी है। घोर निराशा उसी का परिणाम है।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि हम विरोधाभासों से ग्रस्त हैं। एक ओर सन्त हैं, विचारक और प्रचारक हैं और उनके विचार सुनने के लिए भीड़ उमड़ पड़ती है। धार्मिक ग्रन्थों का प्रकाशन और उसके पाठकों की संख्या भी कम नहीं है। पर इसका दूसरा पक्ष भी है।  जीवन और व्यवहार में अनैतिकता की वृद्धि हो रही है। समाज संघर्ष से संत्रस्त है। ऐसी स्थिति में यह प्रश्न उठाना स्वाभाविक ही है क्या इन ग्रन्थों और महापुरुषों की कोई सार्थकता है ? इस उमड़ती हुई भीड़ का कोई मूल्य है ? झुँझलाहट भरे स्वर में बोल उठते हैं यह सब कुछ व्यर्थ है, बकवास है। पर मुझे यह यथार्थ प्रतीत नहीं होता। कभी-कभी मेरे मन में यह प्रश्न भी उठता है कि भ्रष्टाचार के प्रति हमारा यह आक्रोश यथार्थ भी है या नहीं ? राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक मञ्चों से आक्रोश प्रगट करने वाले महानुभव क्या सचमुच ही उतने व्यथित या चिन्तित हैं जितने वे मञ्च पर भाषणों के माध्यम से प्रतीत होते हैं ? वस्तुतः यह आक्रोश बौद्धिक ही होता है, जो बहुधा सभा मात्र पर ही अधिक मुखर होता है। पर जिसमें यह आक्रोश यथार्थ है वे क्या करें ? मैं चाहता हूँ कि ऐसे महानुभाव पौराणिक काल की धारणा के सत्य को भी सामने रखें।

प्रति क्षण परिवर्तित होने वाले काल में एकरसता की आशा करना व्यर्थ है। कोई भी मनःस्थिति या परिस्थिति, भले ही वह हमें कितनी भी प्रिय क्यों न हो, स्थिर नहीं रहती। यद्यपि उसे स्थिर रखने की आकांक्षा और प्रयत्न सर्वथा मानवोचित हैं। वस्तुतः सत्य और मानवीय प्रयत्नों के बीच एक विचित्र विरोधाभास है। अनादि काल से अगणित पत्नों के बाद भी मानवीय समस्याओं का कोई शाश्वत समाधान, जो सर्वथा मनःस्थितियों और परिस्थितियों को अपरिवर्तित रख सके, प्राप्त नहीं हुआ। इससे व्यक्ति में कभी-कभी घोर नैराश्य का जन्म होता है, उसे लगने लगता है कि क्या मूल्य है इस मानवीय प्रयत्नों का ? इसलिए प्राचीन परम्परा में ऐसे मनीषियों की कमी नहीं रही जो इसे असमाधेय मानकर इससे पूरी तरह उदासीन हो जाते हैं। वैराग्य की यह परम्परा बड़ी पुरानी है। ऋषभदेव और जड़भरत जैसे महापुरुष बहिरंग विश्व से उदासीन होकर अपने आत्मस्वरूप में स्थित हो जाते हैं। कुछ लोगों को उसमें पलायनवादी वृत्ति का साक्षात्कार होता है, वे अनवरत प्रयत्न और पुरुषार्थ पर विश्वास रखते हैं। श्रीमद्भागवद्गीता और श्रीरामचरितमानस में इन दोनों के सामञ्जस्य का प्रयास दृष्टिगोचर होता है। इस दिशा में इनमें प्रगट किये गये विचार सामाजिक दृष्टि से बड़े स्वस्थ और सन्तुलित हैं। इस प्रसंग में जीवन और मृत्यु से सम्बद्ध एक चिकित्सक की दृष्टि को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। रोग के विरुद्ध औषधियों के माध्यम से वह व्यक्ति के जीवन के लिए अन्तिम क्षण तक प्रयत्नशील रहता है। कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि उसने व्यक्ति को मृत्यु के मुख से उबार लिया। रोगी और उसके परिवार के सदस्य वैद्य के प्रति कृतज्ञ होते हैं। पर एक क्षण ऐसा आता है जब चिकित्सक के सारे प्रयत्न व्यर्थ हो जाते हैं और तब उसे जीवन के उस छोर का साक्षात्कार होता है जिसे हम मृत्यु के रूप में जानते हैं, जिसे टाला नहीं जा सकता। चिकित्सक को इस कटु का साक्षात्कार करने के लिए भी प्रस्तुत रहना चाहिए। किन्तु मृत्यु का यह सत्य उसे अपने प्रयत्न से विमुख न कर दे तभी वह सन्तुलित व्यक्ति कहा जा सकता है। गीता और रामायण में यही दृष्टिकोण विद्यमान है।

मानस में लक्ष्मण जी की पुरुषार्थ प्रेरकवाणी विद्यमान है, वे ‘दैव या नियति’ के समक्ष सिर झुकाने के लिए प्रस्तुत नहीं हैं। वे दैव और नियति की बातों को आलस्य तथा कायरता का प्रतीक मानते हैं-

मन्त्र न यह लछिमन मन भावा।

राम बचन सुनि अति दु:ख पावा।।

नाथ दैव कर कवन भरोसा।

सोषिअ सिन्धु करिअ मन रोषा।।

कादर मन कहुँ एक अधारा।

दैव दैव आलसी पुकारा।।

5/50/2-4

भगवान् राम लक्ष्मण की इस ओजस्वी वाणी से आनन्दित होते हैं। फिर भी वे दैव को सर्वथा अस्वीकार करने के लिए प्रस्तुत नहीं होते। इस विषय में वे अपना दृष्टिकोण पहले ही प्रकट कर चुके हैं। वे प्रयत्न के साथ दैव को जोड़े बिना नहीं रहते-

सखी कही तुम नीकि उपाई।

करिअ दैव जौं होइ सहाई।।

5/50/1

वे लक्ष्मण के अग्रज के साथ-साथ गुरु वशिष्ठ के शिष्य भी तो थे। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ एक ऐसे महापुरुष के रूप में प्रतिष्ठित थे जिनके विषय में यह प्रसिद्ध था कि उनके लिए कुछ भी अशक्य नहीं था। बहुधा लोगों को ऐसा प्रतीत हुआ कि वे विधि-व्यवस्था को भी परिवर्तित करने में समर्थ हैं। उनकी स्तुति इन शब्दों में की गयी –

सो गोसाइँ बिधि गति जेहिं छेंकी।

सकइ को टारि टेक जो टेकी।।

2/254/8

उनके विषय में लोगों की चाहे कैसी भी धारणा क्यों न रही हो, पर ब्रह्मार्षि विनम्रतापूर्वक उसे अस्वीकार करते हुए दिखाई देते हैं। वे विधि की अनिवार्यता का प्रतिपादन करते हैं। अन्ततोगत्वा अयोध्या में विपत्ति के जो बादल उमड़ आये थे उसे रोक पाने में वे स्वयं को समर्थ नहीं पाते। जब महाराजश्री दशरथ ने उनसे रामभद्र के राज्याभिषेक के सन्दर्भ में प्रश्न किया तब वे उत्साहित होकर बोल पड़े-

बेगि बिलम्ब न करिअ नृप सजिअ सबुइ समाजु।

सदिन सुमंगल तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु।।2/4

किन्तु यह कैसी विधि विडम्बना थी कि उनका यह उतावला प्रयास ही अनर्थों का हेतु बन बैठा। यदि राज्याभिषेक की घड़ी में इतनी शीघ्रता न की जाती तो उस प्रतिक्रिया का प्रश्न ही न उठता जो मन्थरा और कैकई के मन में उत्पन्न हुई, जिसका अन्तिम परिणाम राम के वनगमन और महाराजश्री दशरथ की मृत्यु के रूप में हुआ। भरत को यह आश्चर्य था कि गुरु वशिष्ठ जैसे महापुरुष के रहते हुए भी इतने बड़े अनर्थ की सृष्टि कैसे हुई ? ब्रह्मर्षि नि:संकोच भान से उनके समक्ष विधि की अनिवार्यता का प्रतिपादन करते हैं-

सनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।

हानि लाभु जीवनु मरनु जस अपजसु बिधि हाथ।।2/179

भरत इस अनिवार्यता को स्वीकार करते हुए भी रामराज्य की स्थापना के प्रयास से विरत नहीं होते। वे अयोध्या के सारे समाज को लेकर चित्रकूट की यात्रा करते हैं, राम को लौटाने में उन्हें तत्काल सफलता प्राप्त नहीं होती, पर चौदह वर्ष के अन्तराल के पश्चात् उनका संकल्प साकार होता है। इस तरह प्रयत्न और काल की अनिवार्यता के सिद्धान्त का सामांजस्य मानस में दृष्टिगोचर होता है।

महाभारत में भी काल की अनिवार्यता का प्रतिपादन बार-बार किया गया है। काल कि इस अनिवार्यता के प्रतिपादन से मनुष्य के अन्त:करण में निरुपायता का बोध होता है, लगता है कि व्यक्ति के सारे प्रयत्न व्यर्थ हैं। कभी-कभी यह प्रश्न उठना भी स्वाभाविक ही है। क्या यह काल ईश्वर का प्रतिद्वन्द्वी है, जो ईश्वर की सृष्टि को अपनी इच्छा के अनुरूप चलाने की चेष्टा करता है ? क्या उसकी यथ्चेछाचारिता को रोकने की क्षमता ईश्वर में नहीं है ? अन्य कुछ धर्मों में ईश्वर के एक प्रतिद्वंद्वी की कल्पना की गयी जिसे बहुधा शैतान का नाम दिया गया है, जो व्यक्ति को अपनी दिशा में प्रेरित करता है। दूसरी ओर ईश्वर के दूत उसे सन्मार्ग की दिशा में प्रेरित करते हैं। यह प्रतिद्वन्द्विता शाश्वत है। एक स्तर में हिन्दू धर्म ने भी इसे स्वीकार किया है। गीता में अर्जुन के द्वारा यह पूछे जाने पर कि ‘न चाहते हुए भी व्यक्ति पाप की ओर क्यों प्रवृत्त होता है, ऐसा लगता है कि जैसे बलपूर्वक पाप की दिशा में ले जाने की चेष्टा करता है’-

अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुष:।

अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजित:।। गीता/3/36

भगवान् श्रीकृष्ण इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि अर्जुन, ये काम और क्रोध हैं, जो व्यक्ति को पाप की दिशा में ले जाते हैं। ये व्यक्ति के महाशत्रु हैं और इनका वध किया जाना चाहिए-

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव:।

महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम्।। गीता/3/37

किन्तु एक स्तर ऐसा आता है जहाँ वे यह कहते हैं कि ईश्वर ही सबकी अन्तरात्मा में बैठा हुआ उन्हें कठपुतली की तरह नचा रहा है-

ईश्वर: सर्वभूतानाम् हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।

भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।। गीता/18/61

इन दोनों प्रकार की विचारधाराओं में परस्पर विसंगति-सी प्रतीत होती है, पर भिन्न स्तरों पर विचार करने पर इस विरोधाभास का सामंजस्य मिल जाता है। इसे रंगमंच पर प्रयुक्त किये जाने वाले नाटक के माध्यम से हृदयंगम किया जा सकता है। नाट्य-मंच पर नायक और खलनायक परस्पर विरोधी प्रतीत होते हैं और दर्शक के लिए इस विरोध को वास्तविक माने बिना नाट्य-रस की अनुभूति नहीं हो सकती, पर नाट्य-मंच के पीछे का सत्य इससे भिन्न है। वहाँ देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि नायक और खलनायक सूत्रधार की इच्छा के द्वारा ही संचालित होते हैं। जीवन और व्यवहार का सत्य तो नाट्यशाला का ही सत्य है, किन्तु जो व्यवहार जगत् से ऊपर उठकर विचार और मुक्ति में जीवन की सार्थकता मानते हैं, वे परदे की आड़ में छिपे हुए सूत्रधार की ओर दृष्टि डालते हैं। इससे उनका अन्त:करण राग-द्वेष से मुक्त हो जाता है। किन्तु यह विचार जगत् की व्यक्तिगत अनुभूति के रूप में ही देखा जाना चाहिए। व्यवहार में इसकी स्वीकृति जटिलताओं की सृष्टि करती है।

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Paperback

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Hindi

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2014

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