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Description
सुर जो सजे
हिंदी फिल्म संगीत को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने और उसमें निहित सृजन की सोच पर ‘सुर जो सजे’ अपने ढंग की मौलिक और निराली पुस्तक है। लेखक ने इसमें फिल्म संगीत के बहुत-से स्तरों पर अब तक अनकहे इतिहास को संस्मरण-संवाद की अपनी विशिष्ट शैली में संजोया है। लोकप्रिय फिल्मी गीत के इतिहास के अंतर्गत उसकी धुन, उसके लिखे जाने और उसे संगीतबद्ध किए जाने के पीछे की कोई कथा, कोई व्यथा या अन्य कोई घटना, प्रसंग का इसमें रोचक वर्णन है। लेखक का मानना है, “कोई सृजन आखिर किसी खास परिस्थिति, किसी खास दीठ या समय की तात्कालिक संवेदना से ही तो उपजता है।…” फिल्मी गीतों के साथ भी यही रहा है। वहाँ जब भी सुर सजे हैं, उनके गहरे निहितार्थ रहे हैं। संगीत सृजना के क्षण आपके समक्ष जैसे जीवंत हो उठे हैं और संगीतकार, गीतकार, गायक के साथ जैसे आप संवाद कर रहे हैं। पुस्तक की शुरुआत फिल्म संगीत से जुड़ी हस्तियों के संस्मरण-संवाद से होती है।…और फिर शुरू होती है फिल्मी गीतों से जुड़ी ‘सरगम’ की रोचक दास्ताँ। ‘सुर जो सजे’ लेखक की संगीत रुचि की अंतर्यात्रा है। पढ़ते हुए लगेगा आप भी संगीत सृजन की उनकी इस यात्रा में साथ हैं। पुस्तक में संगीतकारों, गीतकारों के साथ हुए लेखक के संवाद संस्मरणात्मक रूप में प्रस्तुत किए गए हैं।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2014 |
| Pulisher |











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