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Description
आधा भरा गिलास
हर सूर्योदय एक सविंदय की आशा अपने साथ लिए आता है। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद एक बात तो तय है कि आप जागृत अवस्था में होंगे। हम अपने जीवन को जीना सही मायनों में तभी शुरू करते हैं, जब हम जागृत अवस्था में होते हैं। ‘आशा भरा गिलास’ उस अवसर हाथ आते-आते छूट जाने वाले गुलदस्ते केंद्र यानी ‘सेंटर ऑफ़ ग्रेविटी’ की तलाश की कोशिश है, जो हमें विकास और प्रगतिशीलता की ओर प्रेरित करता है। असल चुनौती यही है कि हम किस तरह से और क्या सोचते हैं। अगर गिलास को आधा भरा दिखाया जाता है फिर चाहे मुसलाधार बारिश हो क्यों न रही हो, वो भरा नहीं। गिलास तभी भरा हुआ होगा जब उसे सही ढंग से रखा जाए। मनुष्य का मस्तिष्क भी कुछ इसी तरह से काम करता है। यह सोचते हुए कि ‘क्या मैं यह कर सकता हूँ?’ एक इंसान एक ही स्थान पर अटका रह सकता है, क्योंकि वह संशय में है, जबकि वहीं कोई दूसरा इंसान निरंतर प्रगतिशील है क्योंकि उसे खुद पर भरोसा है और वह खुद से कह रहा है, ‘मैं यह कर सकता हूँ।’
Additional information
| ISBN | |
|---|---|
| Authors | |
| Binding | Paperback |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2025 |
| Pulisher |











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