Pratham Pratishruti

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Pratham Pratishruti

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Author: Ashapurna Devi

Availability: 5 in stock

Pages: 456

Year: 2021

Binding: Paperback

ISBN: 9788195058174

Language: Hindi

Publisher: National Publishing House

Description

प्रथम प्रतिश्रुति

प्रथम प्रतिश्रुति घर की चहारदीवारी में बंदिनी भारतीय नारी के अभिशप्त जीवन की व्यथा-कथा ! एक सार्थक संघर्ष का दस्तावेज़। संघर्ष, जिसे आठ बरस की उम्र में ही ब्याह दी गयी सत्यवती ने पति से, परिवार से, समाज से लड़ा ताकि आने वाली पीढ़ियां उसकी भोगी गयी यातना से मुक्त रहें। बंगाल के ग्राम्य जीवन और परंपराओं तथा संस्कारों के मर्मस्पर्शी चित्रों से भरपूर यह उपन्यास पहले टैगोर पुरस्कार और फिर 1977 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित।

1

सत्यवती की यह कहानी मेरी लिखी हुई नहीं है। यह कहानी वकुल की कॉपी से ली गयी है। वकुल ने कहा था, इसे कहानी कहना चाहो तो कहानी है, वास्तव कहना चाहो तो वास्तव।

वकुल को मैं बचपन से देखती आयी हूं। सदा कहा किया है, ‘वकुल, तुम पर कहानी लिखी जा सकती है।’ वकुल हंसती है। कौतुक और अविश्वास की हंसी। उहूं, वह खुद भी नहीं सोचती कि उस पर कहानी लिखी जा सकती है। अपने बारे में उसे कोई मूल्यबोध नहीं, कोई चेतना ही नहीं।

वकुल भी इस दुनिया के लोगों में से एक है, यह बात मानो वह मान ही नहीं पाती। वह महज यही समझती है कि वह कुछ भी नहीं, ‘कोई भी नहीं। निहायत मामूली लोगों में एक, बिलकुल साधारण। जिन पर कहानी लिखना चाहो तो लिखने को कुछ भी नहीं मिलता।

वकुल की ऐसी धारणा जो बनी, शायद हो कि इसके पीछे उसकी ज़िंदगी की बुनियाद की तुच्छता हो। शायद हो कि आज बहुत कुछ पाने के बावजूद छुटपन में बहुत कुछ न पाने का झोभ रह गया हो उसके मन में। उसी क्षोभ ने उसके मन को बुझा-बुझा-सा कर रखा हो, कुंठित कर रखा हो उसकी सत्ता को।

वकुल सुवर्णलता के बहुत-से बाल-बच्चों में से एक है। उसके अंतिम ओर की लड़की।

सुवर्णलता के घर में वकुल की भूमिका अपराधी की थी। जैसे विधाता का यह निर्देश हो कि उसे अजाने अपराध से हर समय संत्रस्त रहना पड़ेगा।

इसलिए वकुल का शिशु मन एक अजीब धूप-छांही परिमंडल में तैयार हुआ था, जिसका कुछ हिस्सा तो सिर्फ़ भय, संदेह, आतंक और घृणा का था और कुछ ज्योतिर्मय रहस्यपुरी की चमकती चेतना से दीपित। फिर भी मनुष्य को प्यार किये बिना नहीं रह सकती वकुल। मनुष्य को प्यार करती है, तभी तो…

लेकिन छोड़िए भी, यह तो वकुल की कहानी है नहीं। वकुल ने कहा है, मेरी कहानी यदि लिखनी ही है तो आज नहीं, और कभी। जीवन की लंबी राह तय कर आने के बाद वकुल ने समझना सीखा है, दादी-परदादी का ऋण चुकाये बिना अपनी बात नहीं कहनी चाहिए।

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Paperback

ISBN

Language

Hindi

Pages

Publishing Year

2021

Pulisher

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