Stree Vimarsh Avadharna Aur Swaroop
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स्त्री विमर्श अवधारणा और स्वरूप
स्त्री विमर्श पर हिंदी में दो दर्जन से भी अधिक पुस्तकें मेरे देखने में आयी हैं। परंतु उनमें से किसी भी पुस्तक में स्त्री विमर्श की अवधारणा को, उसके स्वरूप को, उसकी सैद्धांतिकी को विस्तार से प्रस्तुत नहीं किया गया है।
इस पुस्तक में संभवतः पहली बार डॉ. रमा बुलबुले नवले जी स्त्री विमर्श की सैद्धांतिकी को विस्तार के साथ प्रस्तुत कर रही हैं। इसके अलावा स्त्री विमर्श की भारतीय और पश्चिमी वैचारिकता को भी वह संक्षेप में प्रस्तुत करती हैं। स्त्री विमर्श के प्रमुख वैचारिक प्रवाहों की विवेचना के बाद वे स्त्री विमर्श की भाषा को लेकर अपना मौलिक चिंतन प्रस्तुत करती हैं। हिंदी साहित्य क्षेत्र में स्त्री विमर्श की उपलब्धियों का मूल्यांकन उन्होंने प्रस्तुत किया है।
उनके इस विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत में 19वीं सदी के नौवें दशक में चार प्रतिभावान स्त्रियों ने ताराबाई शिंदे (स्त्री-पुरुष तुलना), एक अज्ञात लेखिका (सीमांतनी उपदेश), पंडिता रमाबाई (अंग्रेजी में भारतीय स्त्री की समस्याओं से संबंधित लेखन) तथा रुकैया सखावत हुसैन (बांग्ला और अंग्रेजी में स्त्री अस्मिता से संबंधित लेखन) अपने लेखन द्वारा स्त्री अस्मिता को उजागर करने का प्रयत्न किस प्रकार किया था। इन चारों के लेखन का सारांश देते हुए उस पर वह अपनी टिप्पणी भी देती हैं।
यह पुस्तक इस विषय से संबंधित अध्येताओं तथा इस विषय का अध्ययन-अध्यापन करने वाले छात्र-छात्राओं तथा प्राध्यापकों के लिए महत्वपूर्ण साबित होगी। मुझे विश्वास है कि हिंदी जगत में इस पुस्तक का उचित स्वागत होगा। इस महत्त्वपूर्ण लेखन के लिए मैं डॉ. रमा बुलबुले नवले जी का अभिनन्दन करता हूँ।
– डॉ. सूर्यनारायण रणसुभे, लातूर
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2024 |
| Pulisher |











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