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Description
अपनी केवल धार
समय इतना कुशल अनुवादक है कि पद-संहति, वाक्य-विन्यास आमूल-चूल बदल जाने के बाद भी ऋचाओं और सूक्तियों के मूल भाव-बोध पर आँच नहीं आने पाती। शायद यही वजह हो कि अरुण कमल जब कहते हैं “यह वह समय है जब/शेष हो चुका है पुराना/और नया आने को शेष है”, तो ऐसा प्रतीत होता है, मानो वे अपनी ही एक उक्ति “सारा लोहा उन लोगों का/अपनी केवल धार” का तर्जुमा कर रहे हों। यह ‘धार’ ही वह शक्ति और अभिज्ञा है, जो समय का इतना बारीक-इतना सटीक आकलन कवि से करवा ले जाती है और रोज ब रोज अकेला पड़ते जाने का दंश तीखा होते रहने के बावजूद “धरती-आकाश तक फैले सम्बन्ध” उस आस्था की डोर थामे रहते हैं, जो किसी रचनाकार को जीवन से जुड़े रहने और ज़मीन पर एक पाँव खड़े रहने की शक्ति और सामर्थ्य देती है।
1980 के आसपास हिन्दी कवियों की जिस युगतर जमात ने अपनी दन्तुरित मुस्कान बिखेरी थी, उसमें अरुण कमल जीवनधर्मी परम्परा-बोध और जनपक्षधर संघर्ष-चेतना से लैस अलग से पहचाने गये थे। वे जिस आत्मीय भाव से संघर्षरत वृक्षों का दुर्द्धर्ष सौन्दर्य देख रहे थे, दुनिया की सारी गन्दगी के बीच, दुनिया की सारी खुशबू रचते हाथ सूँघ रहे थे, उसी शिद्दत के साथ कलकत्ते के कारखाने में बहाल जलंधर के मजदूर के भीतर चल रहे छँटनी और तनखाहें कटने के द्वन्द्व को, होटल में खाने की थाली सामने रखने वाले लड़के की, किवाड़ की आड़ से झिर-झिर कर आती सलाई को और उन खबरों को पढ़-सुन रहे थे, जिनमें दुनिया-भर की सारी ऊलजुलूलियत के बीच, सबसे जरूरी खबर गायब थी। अपनी तीस साल की काव्य-यात्रा में अरुण कमल यदि जीवनधर्मी परम्परा-बोध और जनपक्षधर संघर्ष-चेतना के साथ, उत्तर-आधुनिक मनुष्य विरोधी दुश्चक्रों को परिभाषित करने की सामर्थ्य अर्जित कर सके, तो इसका श्रेय उनकी ‘अपनी केवल धार’ को जाता है, जिसे हम आज की कविता के घोषणापत्र की तरह पढ़ सकते हैं।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2006 |
| Pulisher |











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