Bazar Ke Beech Bazar Ke Khilaph

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Bazar Ke Beech Bazar Ke Khilaph

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Author: Prabha Khetan

Availability: 5 in stock

Pages: 254

Year: 2021

Binding: Paperback

ISBN: 9789352295326

Language: Hindi

Publisher: Vani Prakashan

Description

बाजार के बीच बाजार के खिलाफ़

ज़्यादातर नारीवादी चिन्तकों का कहना है कि भूमण्डलीकरण का खमियाजा स्त्री वर्ग को भोगना पड़ रहा है। अब तक राज्य की कल्याणकारी भूमिका के अन्तर्गत स्त्री को जो थोड़ी-बहुत सुरक्षा और सुविधा मिलती आयी थी, स्त्रियाँ उससे वंचित होने लगी हैं। व्यक्तिवादी पुरुष आदर्शों पर आधारित एक नये वर्ग की पहचान उभर कर आयी है जिसमें स्त्री-पुरुष को समान होना है एवं समान स्तर पर भूमण्डल का सामना करना है।
भूमण्डलीकरण राजनीति से अर्थव्यवस्था को अलग करता हुआ नज़र आ रहा है ताकि पारिवारिक और निजी जीवन से अलग स्वतन्त्र, नैतिक और सार्वजनिक क्षेत्र को स्थापित किया जा सके। बहुतेरे गैर-सरकारी नारीवादी संगठनों और समूहों ने पश्चिमी नारीवादी विचार और संघर्ष को थोक भाव में स्वीकारे जाने का विरोध किया और यह उचित भी था। किन्तु नारीवाद के लिए समस्या तब पैदा होती है जब इस विरोध का स्वर दक्षिणपन्थी खेमे के यानी पूँजीपति के स्वर से मेल खाने लगता है। नारीवाद के लिए एक ओर पूर्व-पश्चिम मिलाप से एक बेहतर भूमण्डलीय समझ उत्पन्न हो रही थी, तो दूसरी ओर इस आपसी सहयोग से स्त्रियों को अधिक से अधिक नवउदारतावादी सार्वजनिक स्पेस उपलब्ध हो रहा था। मगर उन्हें अपनी स्वतन्त्र वैचारिक ज़मीन नहीं मिल रही थी। दिक्कत यह है कि उत्तर-समाजवादी सन्दर्भ में भूमण्डलीय ताकत और स्थानीय व्यवहार की द्वन्द्वात्मकता को हम समझ ही नहीं पा रहे हैं। नवउदारतावादी और समकालीन मार्क्सवादियों के अनुसार भूमण्डलीय आर्थिक ताकतें विश्व बाज़ार की प्रमुख संचालक हैं। मगर ये अकेले ही परिवर्तन नहीं ला रही हैं।
परिवर्तन घट रहा है स्थानीय प्रतिक्रियाओं के आधार पर। अपने-आप में इसकी द्वन्द्वात्मकता काफी सबल है। स्त्री-पुरुष के लैंगिक सम्बन्धों को ध्यान से देखने पर इस अध्ययन में हमारी यात्रा विशिष्ट से सामान्य की ओर है। भूमण्डलीकरण और उत्तर समाजवादी परिवर्तन के आपसी सम्बन्ध के स्पेस पर हमें ध्यान केन्द्रित करना है। लैंगिक सम्बन्धों के नये आदर्श पश्चिम से आयात किये गये हैं। स्त्री को इससे पहचान तो मिली, मगर दूसरी ओर पहचान के साथ उसकी यौनिकता और श्रम का वस्तुकरण हुआ है।

बहुराष्ट्रीय बाजार व्यवस्था के कारण यौन वस्तुकरण और राष्ट्रेतर यौन बाज़ार में स्त्री का जींस की भांति बिकना वास्तव में भारतीय जनतन्त्र में एक शोषणकारी परिणाम के रूप में उभरा है। दूसरी ओर लैंगिक सम्बन्ध और पहचान पर उठी बहस का विधेयक पहलू यह है कि नये भूमण्डल के आदर्श और संस्कृति ने स्त्री को मीडिया में एक व्यक्ति और नागरिक के रूप में सशक्त किया है। औपचारिक राजनीति में पुरुषों की भागीदारी बढ़ रही है। आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर से ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया है। स्त्रियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी आयी है। पुरुषों का वर्चस्व बढ़ा है। मगर इसी के साथ पंचायत स्तर पर स्त्री की सरगर्मी नज़र आ रही है। स्त्री राजनीति की मुख्यधारा में अनुपस्थित है किन्तु वह नागरिक समाज में प्रमुख वक्ता के रूप में उभर रही है। अतः जो नयी सम्भावनाएँ उभर कर सामने आयी हैं वह भूमण्डलीय स्तर और भारतीय जनतन्त्र के भीतर नागरिक समाज की मुक्ति में स्त्रियों के हस्तक्षेप को स्पष्ट रूप से उजागर करती हैं।

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Authors

Binding

Paperback

ISBN

Language

Hindi

Pages

Publishing Year

2021

Pulisher

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