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Description
कैमरे वालियाँ (महिला फोटोग्राफरों की रोमांचक दुनिया)
सर्वेश के निजी और प्रोफ़ेशनल जीवन के लम्बे और सफल संघर्ष को मैंने बहुत लम्बे समय से देखा और जाना है। हिन्दी पत्रकारिता से जुड़ी बहुत कम महिलाओं ने उसकी जैसी जिजीविषा और निष्ठा से मर्दानगी उपस्थिति और सोच से भरी पत्रकारिता, उसकी भी (बेहद तकनीकी जटिलताओं और सततघुमक्कड़ी की अतिरिक्त चुनौतियों से भरी) फोटो पत्रकारिता शाखा में इतने समय तक इतना डटकर अच्छा काम किया है। उसके अनथक उत्साह, नारी दुर्लभ साहस और रचनात्मकता के लिए मेरे मन में गहरा आदर है।
आज जिसे हम आधुनिक नारीवादी सोच मानते हैं, उसके इतिहास के समग्र दर्शन हमको सर्वेश सरीखी हाड़-मांस की ज़मीनी पेशेवर महिलाओं के निजी साक्ष्यों के बिना नहीं हो सकते। और न ही हम एक विरल आजीविका चुनकर सफल होने वाली महिलाओं की उन कहानियों के बिना हम लोग अपने राजसमाज के भीतरी गलियारों और पत्रकारिता में औरतों ने किस तरह पैठ बनाई इस बाबत कई अनकही सचाइयों से वाक़िफ़ हो पायेंगे जो सर्वेश ने इस किताब में संकलित की हैं। आधुनिक राजसमाज तथा मीडिया में तेज़ी से आ रहे तकनीकी बदलावों से पेशेवर पत्रकारों के जीवन और आजीविका पर मँडराते नये ख़तरों का कोई सटीक राष्ट्रीय आकलन भी हम तभी पेश कर सकते हैं जब उसके हर विभाग हर शाखा में कार्यरत महिलाओं के अनमोल अनुभवों को भी ग़ौर से देखें समझें। किस तरह आम महिला की रचनात्मक क्षमता हर क्षेत्र में बुनियादी तौर से संदिग्ध मान ली जाती है और इस ग़लत-सलत धारणा को निरस्त करा पाने में महिलाओं की कितनी ऊर्जा और समय बरबाद होते हैं। फिर जगह बन भी गयी तो यदि वह कार्यक्षेत्र नयी चुनौतियों से जूझता है तो उसका असर कैसे पेशेवर महिला और पुरुष कर्मियों पर अलग-अलग तरह से पड़ता है? किस तरह हर कहीं छँटनी शुरू होने पर सबसे पहली शिकार महिलाएँ बनती हैं और इसकी बुनियाद में किस तरह की मानसिकता होती है ?
मेरा मानना है कि राजसमाज के सारे तन्त्र की बाबत हमारी समझ और संवेदना का दायरा कुछ और बढ़ाने में यह किताब समाजशास्त्रियों, पत्रकारों और पेशेवर कामकाजी महिलाओं के अलावा सभी संवेदनशील न्यायप्रिय पाठकों के लिए भी निश्चय ही बहुत उपादेय होगी।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| Language | Hindi |
| ISBN | |
| Pages | |
| Publishing Year | 2026 |
| Pulisher |











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