-25%
- Description
- Additional information
- Reviews (0)
Description
घट रही है रोज़ मेरी चेहरगी
घटती हुई चेहरगी बढ़ती हुई उम्र का बयान न होकर ज़िन्दगी में बढ़ती हुई ज़ेहनियत, तजरबे और परिपक्वता की निशानी है। चन्द्रशेखर वर्मा की ग़ज़लें बताती हैं कि चेहरगी का घटना कोई नकारात्मक एहसास न होकर ज़िन्दगी का वह ख़ूबसूरत मोड़ है जहाँ इंसान का दिल और दिमाग़ दोनों गहरे, ज़्यादा सच्चे और ज़्यादा ख़ूबसूरत हो जाते हैं।
ज़िन्दगी के हर सफ़र में हम बहुत खोते हैं अपनी मंज़िल को पाने के लिए, यह किताब उसी सफ़र की तर्जुमानी है— चेहरे को खो कर अपनी रूह को पाने की कहानी है। बाहर से घटते हुए भी भीतर से बढ़ते जाने की दास्तान है।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2025 |
| Pulisher |











Reviews
There are no reviews yet.