Gyandan

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Gyandan

Gyandan

95.00 71.00

In stock

95.00 71.00

Author: Yashpal

Availability: 5 in stock

Pages: 147

Year: 2024

Binding: Paperback

ISBN: 9788180314646

Language: Hindi

Publisher: Lokbharti Prakashan

Description

ज्ञानदान


भूमिका

हम एक माप निश्चित करके सब वस्तुओं की नाप लेते हैं। नाप ही हमारी धारणा में वस्तुओं के परिचय और स्थिति का आधार होता है परन्तु यह माप है क्या; माप का अपना अस्तित्व क्या है ? एक गज या एक सेर हमारे अनुमान और धारणा में निश्चित सीमा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। उनका परिमाण और आयतन जितना है, उसके कम या अधिक भी हो सकता था। तब भी माप के रूप में भिन्‍न परिमाण में गज या सेर वस्तुओं की स्थिति उसी प्रकार निश्चित करते, जैसे वे अब करते हैं। अन्य वस्तुओं के अस्तित्व की एक धारणा निश्चित करने के लिये उपयोगी होकर भी माप (गज, सेर, गेलन या पाउण्ड) का अपना कोई स्वतः पार्थिव अस्तित्व नहीं है। यह केवल मान्यताएँ ही हैं।

यही हमारे ज्ञान के सम्बन्ध में है। संसार भर के उचित-अनुचित को निश्चय करने वाली माप या कसौटी हमारा ज्ञान है परन्तु हमारा यह ज्ञान स्वयं कितनी अनिश्चित वस्तु है ! और उस अनिश्चित ज्ञान के साधन से निश्चित किया गया मनुष्य और उसके समाज द्वारा उचित और अनुचित का यह विराट आयोजन भी कितना अनिश्चित है।

मनुष्य-समाज ने अपने जीवनकाल में एक तत्व पहचाना है कि सदा निश्चित और स्थिर कुछ भी नहीं है। ज्ञान भी अनिश्चित और परिवर्तनशील है। उसकी कोई सीमा नहीं है। आगे बढ़ सकने में ही ज्ञान की सार्थकता और हेतु है। ज्ञान आगे बढ़ कर विकास का परिवर्तन स्वीकार करे और जीवन के क्षेत्र को व्यापक बनाये, यह ही ज्ञान की सफलता है परन्तु मनुष्य के और उसके समाज के ज्ञान से उत्पन्न उसके विश्वास और धारणाएँ ही उसके ज्ञान पर सीमाएँ और बन्धन लगा देती हैं।

ज्ञान का स्रोत है, जिज्ञासा-यानी “क्यों ?” अपने अभ्यस्त विश्वासों और धारणाओं के मोह में मनुष्य ज्ञान के आगे बढ़ने से भयभीत होने लगता है। वह ‘क्यों’ को ही अनुचित बताने लगता है। मनुष्य अपने जीवन के स्रोत, ज्ञान की धारा का अवरोध करने के लिए, उस पर विश्वास और धारणा के वजनी पत्थर रख देना चाहता है।

मानव-समाज के जीवन स्रोत और आधार का अवरोध मानव की आत्म-हत्या नहीं तो क्या है ? मनुष्य आत्म हत्या द्वारा जीवित रहने का प्रयत्न करना चाहे तो मूर्खता ही है। धारणा को न बदलने के लिये वह अपनी जान देने और दूसरों की जान लेने की वीरता का अभिमान करता है। अपने वर्तमान स्वार्थ की रक्षा के लिए जानने और परिवर्तन के प्रयत्न को वह पाप और अनाचार बताकर, जीवन के विकास की प्रगति और सम्भावना का मार्ग बन्द कर देना चाहता है। ‘क्यों’ की यह कुंजी जो जीवन की अनेक मंजिलों पर लगे बन्द द्वारों को खोल कर जीवन के लिए व्यापक क्षेत्र प्रस्तुत करती है, उसे अप्रिय, भयानक और घृणित जान पड़ने लगती है परन्तु मनुष्य को यदि जीवित रहना है तो जीवन की व्यापकता का मार्ग बन्द करने वाले विश्वासों और धारणाओं के तालों को ‘क्यों’ की कुंजी से खोलते रहना आवश्यक है। इसी में उसका कल्याण है, मनुष्यत्व की सार्थकता है।

पाठकों के सहयोग से ही इन कठिन परिस्थितियों में भी यह अपनी आठवीं पुस्तक प्रकाशित करना मेरे लिये सम्भव हो सका। जीवन के दूसरे क्षेत्रों की ही भाँति साहित्य के क्षेत्र में भी अपनी पत्ली प्रकाशवती पाल का पूर्ण सहयोग मेरा सबसे बड़ा सहायक है। उन्हें धन्यवाद !

अनुक्रम

  • ज्ञानदान
  • एक राज़
  • गण्डेरी
  • कुछ समझ न सका
  • दुःख का अधिकार
  • पराया सुख
  • ८०/१००
  • या सांई सच्चे !
  • जबरदस्ती
  • हलाल का टुकड़ा
  • मनुष्य
  • बदनाम
  • अपनी चीज़

Additional information

Authors

Binding

Paperback

ISBN

Language

Hindi

Pages

Publishing Year

2024

Pulisher

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