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Kala Ki Zaroorat
₹695.00 ₹525.00



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₹695.00 ₹525.00
Author: Ernst Fisher
Pages: 248
Year: 2019
Binding: Hardbound
ISBN: 9788171780938
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
कला की जरूरत
ऑस्ट्रिया के विश्वविख्यात कवि और आलोचक अंर्स्ट फिशर की पुस्तक कला की जरूरत कला के इतिहास और दर्शन पर मार्क्सवादी दृष्टि से विचार करनेवाली अत्यंत महत्त्वपूर्ण कृति है। कला आदिम युग से आज तक मनुष्यों की जरूरत रही है और भविष्य में भी रहेगी, पर उन्हें कला की जरूरत क्यों होती है ? आखिर वह कौन-सी बात है जो मनुष्यों को साहित्य, संगीत, चित्रकला, मूर्तिकला आदि के विभिन्न रूपों में जीवन की पुनर्रचना के लिए प्रेरित करती है ? इस आधारभूत प्रश्न पर विचार करने के लिए लेखक ने आदिम युग से आज तक के और भविष्य के भी मानव-विकास को ध्यान में रखकर सबसे पहले तो कला के काम और उसके विभिन्न उद्गमों पर विचार किया है और फिर विस्तार से इस बात पर प्रकाश डाला है कि मौजूदा पूँजीवादी तथा समाजवादी व्यवस्थाओं में कला की विभिन्न स्थितियाँ किस प्रकार की हैं।
इस विचार-क्रम में वे तमाम प्रश्न आ जाते हैं जो आज सम्पूर्ण विश्व में कला-सम्बन्धी बहसों के केन्द्र में हैं। आज का सबसे विवादास्पद प्रश्न कला की अंतर्वस्तु और उसके रूप के पारस्परिक सम्बन्धों का है। अंर्स्ट फिशर ने इन दोनों के द्वन्द्वात्मक सम्बन्ध को मार्क्सवादी दृष्टि से सही ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझने-समझाने का एक बेहद जरूरी और महत्त्वपूर्ण प्रयास किया है। आज भारतीय साहित्य के अंतर्गत जो जीवंत बहसें चल रही हैं, उनकी सार्थकता को समझने तथा उन्हें सही दिशा में आगे बढ़ाने में फिशर द्वारा प्रस्तुत विवेचन अत्यधिक सहायक सिद्ध हो सकता है। साहित्य और कला के प्रत्येक अध्येता के लिए वस्तुतः यह एक अनिवार्य पुस्तक है।
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Hardbound |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2019 |
| Pulisher |
अंर्स्ट फिशर
जन्म: 1899 ई., ऑस्ट्रिया के एक सैनिक परिवार में।
उन्होंने भी एक सैनिक के रूप में ही अपना जीवन आरम्भ किया, किन्तु उनकी ज्ञान-पिपासा उन्हें ग्राज़ नामक नगर में ले गई, जहाँ उन्होंने दर्शनशास्त्र का अध्ययन और एक कारखाने में श्रमिक के रूप में काम किया। यहीं वे मजदूर-आन्दोलन से जुड़े। 1927 से 1934 तक उन्होंने विएना में मजदूरों के एक अखबार के सम्पादकीय विभाग में काम किया। इसी बीच उन्होंने सामाजिक-जनवादी पार्टी के अंदर ही वामपंथी विपक्ष के निर्माण की प्रक्रिया शुरू की, लेकिन 1934 में जब इस पार्टी ने फासीवाद के आगे घुटने टेक दिए तो वे कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए।

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