Kisson Ki Pagdandi

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Kisson Ki Pagdandi

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Author: Manoj Kumar Srivastava

Availability: 20 in stock

Pages: 196

Year: 2025

Binding: Paperback

ISBN: 9789355369345

Language: Hindi

Publisher: Bodhi Prakashan

Description

किस्सों की पगडंडी

केंचुली

[1]

“गलत कर रहे हो, हम कहे देते हैं। जिसकी जो जगह ईश्वर ने बनाई है वही सही है। जैसे घूरे को घर में नहीं लाया जाता, साँप को गले नहीं लगाया जाता और जो ब्राह्मण न हो उससे यज्ञ नहीं कराया जाता, उसी प्रकार से पात्र कुपात्र का ध्यान रखकर ही किसी कार्य को किया जाना उचित होता है।” माया ने भूधर सिंह को ज्ञान दिया।

“अरे बाबा ईश्वर ने छोटा बड़ा किसी को नहीं बनाया है। यह तो धन रूपी माया है, जिसे पाकर इंसान बौरा जाता है, वरना क्या राजा और क्या रंक।” भूधर सिंह ने भी अपने ज्ञान का बखान किया।

“मतलब हम बौरा गये हैं, और गलत बात कह रहे हैं। आपकी हाँ में हाँ मिलाएं तो ठीक।” माया क्रुद्ध हो उठी। पत्नी क्रुद्ध हो तो बड़े बड़े भी पानी माँगते हैं, फिर भूधर सिंह क्या चीज थे।

“अरे नहीं बाबा, आम के पेड़ में कभी नींबू लग सकता है ? आज तक कभी गलत हुई हो क्या तुम ? बातें तो हमेशा से ही सही कहती हो, लेकिन आज शायद समझने में थोड़ा भूल कर रही हो।” भूधर सिंह ने मनुहार करते हुए एक बार फिर से समझाना चाहा।

“जब हमेशा सही कहती हूँ तो आज भी सही कह रही हूँ। नौकर से नौकर की ही तरह व्यवहार रखना चाहिये और तुम ही तो कहावत कहते फिरते हो कि ढील देने से अपनी ही पतंग कटती है, फिर नौकर को पढ़ाने में भी नफा नहीं बल्कि अपना ही नुकसान ज्यादा है।” माया ने दृढ़ स्वर में अपनी बात स्पष्ट कर दी।

“अरे राजू नौकर थोड़े न है ! उसका बाप दीना हमारे यहाँ काम करता है बस। इसमें राजू का क्या दोष ? अगर हमारे कुछ सहयोग करने से उसका जीवन सुधरता है तो इसमें क्या गलत है ?”

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Paperback

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Language

Hindi

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Publishing Year

2025

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