Lok Sahitya : Vividh Aayam
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लोक साहित्य : विविध आयाम
लोक समाज का सामूहिक स्पन्दन है, जिसको प्रकृति से जुड़े मानव तथा मानवेत्तर प्राणी सामूहिक रूप से स्पन्दित करते हैं। जिसमें लोक चेतना प्राणधारा है और लोक मंगल अभीष्ट। यहाँ लोक उस गीली मिट्टी की तरह है, जिसमें सृजन की अनंत संभावनाएँ हैं। जब अनुभव रूपी बीज उस मिट्टी से मिलता है, तब कला रूपी एवं संस्कार रूपी पौधा अंकुरित होता है। जिसको प्रकृति और समाज सामूहिक रूप से पल्लवित और पोषित करते हैं। लोक शब्द में इतनी व्यापकता और गहराई है कि जीवन की सभी धाराएँ अपने तटों को सींचती और नवीन करती हुई उसी में समाहित हो जाती हैं। फिर अगली पीढ़ी के मेघ अपने जीवन राग और अनुभवों से पुरानी पीढ़ी के संस्कारों को नवीन गति देते हैं। यह क्रम अनवरत रूप से चलता है। जिससे लोक में स्थिरता नहीं रहती, बल्कि गति बनी रहती है। ‘लोक’ शब्द संस्कृत के ‘लोक दर्शने’ शब्द से लिया गया है, जिसको प्राचीन समय से ही विद्वानों ने अलग-अलग रूपों में व्याख्यायित किया है। ऋग्वेद के सुप्रसिद्ध पुरुष सूक्त में ‘लोक’ शब्द का व्यवहार जीव तथा स्थान दोनों अर्थों में हुआ है।
Additional information
| ISBN | |
|---|---|
| Authors | |
| Binding | Hardbound |
| Language | Hindi |
| Publishing Year | 2025 |
| Pulisher | |
| Pages |











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