

Mera Kya

Mera Kya
₹195.00 ₹150.00
₹195.00 ₹150.00
Author: Waseem Barelavi
Pages: 160
Year: 2011
Binding: Paperback
ISBN: 9789352291472
Language: Hindi
Publisher: Vani Prakashan
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Description
मेरा क्या
लफ़्ज़ और एहसास के बीच का फ़ासिला तय करने की कोशिश का नाम ही शाइरी है। मेरे नज़दीक यही वो मक़ाम है, जहाँ फ़नकार आँसू को ज़बान और मुसकुराहट को इमकान दिया करता है, मगर ये बेनाम फ़ासिला तय करने में कभी-कभी उम्रें बीत जाती हैं और बात नहीं बनती। मैंने शाइरी को अपने हस्सासे वुजूद का इज़हारिया जाना और अपनी हद तक शे’री-ख़ुलूस से बेवफ़ाई नहीं कि। यही मेरी कमाई है और आपके रूबरू लायी है। ज़िन्दगी की हमाजेहती से आँखें चार करने में दिये की लौ की तरह हवाओं से लड़ना मेरा मुक़द्दर ज़रूर रहा, मगर कहीं कोई एहतजाजी ताकत थी, जो मुझे सँभाले रही और बिखरने से बचाये रही। मेरे शे’रों में ये कैफ़ियत तलाश करना मुश्किल नहीं होना चाहिए। फूल से बात करने, कली से हमकलाम होने, घटाओं के साथ पैंग बढ़ाने, भीगते मौसमों से खुल-खेलने, झरनों की मौसीक़ी में खो जाने और हर हुस्न को अपनी आँखों की अमानत जानने वाले मिजाज का अलमिया यह था कि जब ज़िन्दगी की धूप आँखों में उतरी, तो अज़ीयतों के लब खुल गये, मंजर चुभने लगे और ख़्वाब अपनी बेबसी का ऐलान करते दिखे, बदलती मानवियतों के हाथों तस्वीरें बनती रहीं, बिगड़ती रहीं, लेकिन रंग एक तस्वीर में न भर पाया।
क्या खोया, क्या पाया, यह तो न पूछिये, हाँ, इतना ज़रूर है कि हिस्सियाती सतह पर शकस्तोरेख़्त ने मेरे शऊर की आबयारी में क्या रोल अदा किया, इसका पता आप ही लगा सकेंगे। शाइरी मदद न करती, तो ज़िन्दगी के अज़ाब जानलेवा साबित हो सकते थे। वह तो ये कहिये कि ज़रिय-ए-इज़हार ने तवाजुन बरकरार रखने में मदद की और जांसोज धूप में एक बेज़बान शजर की तरह सिर उठाकर खड़े रहने का तौफीक अता की। यह भी एक बड़ा सच है कि फ़नकार अपने अलावा सभी का दोस्त होता है, इसीलिए तख़लीक़कारी और दुनियादारी में कभी नहीं बनती। अब रही नफ़ा और नुक़सान की बात, तो इसके पैमाने फ़नकार की दुनिया में और हैं, दुनियादारों की दुनिया में और। यह सब कहकर मैं अपनी फ़ितरी बेनियाजी और शबोरोज की मस्रूफ़ियत के लिये जवाज़ जरूर तलाश कर रहा हूँ, मगर हक़ यह है कि मुतमइन मैं ख़ुद भी नहीं, फिर भला आप क्यों होने लगे ? बहरहाल, मेरी फ़िक्री शबबेदारियों का यह इज़हार पेशे ख़िदमत है। शबबेदारियों के ये इज़हारिए अगर आपकी मतजससि खिलवतों के वज़्ज़दार हमसफ़र बन सके, तो मेरी खुदफ़रेबी बड़े कर्ब से बच जायेगी।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2011 |
| Pulisher |









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