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Mere Vistar Ka Koi Ant Nahi
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Author: Leeladhar Jagudi
Pages: 144
Year: 2022
Binding: Hardbound
ISBN: 9789392998034
Language: Hindi
Publisher: Nayeekitab Prakashan
मेरे विस्तार का कोई अन्त नहीं
युद्ध हम सोचते हैं कि युद्ध अलग से आता है जब कि युद्ध हमारे साथ ही पैदा हो जाता है हमें आपत्ति है युद्ध के होने से युद्ध को कोई आपत्ति नहीं है हमारे होने से रोज हम युद्ध को किनारे करने जाते हैं और वह है कि हमें किनारे ठेलकर हमारे बीच आ जाता है एक दिन घबड़ाते हैं दो दिन सोच में पड़ जाते हैं फिर रातें और अँधेरी करने में जुट जाते हैं पड़ने वाली चोट का उपचार ढूँढकर रखते हैं घायल होंगे के बाद की मरहम पट्टियाँ जुटा कर रखते हैं ज्यों–ज्यों मरते हैं हम त्यों–त्यों अमर होता जाता है युद्ध।
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Hardbound |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2022 |
| Pulisher |
लीलाधर जगूड़ी
जन्म : 1 जुलाई, 1940; धंगण गाँव (सेम मुखेम), टिहरी (उत्तराखंड)।
राजस्थान और उत्तर प्रदेश के अलावा अनेक प्रान्तों और शहरों में कई प्रकार की जीविकाएँ करते हुए शालाग्रस्त शिक्षा के अनियमित क्रम के बाद हिन्दी साहित्य में एम.ए.। फ़ौज (गढ़वाल राइफ़ल) में सिपाही। लिखने-पढ़ने की उत्कट चाह के कारण तत्कालीन रक्षामंत्री कृष्ण मेनन को प्रार्थना-पत्र भेजा, फलतः फ़ौज की नौकरी से छुटकारा। छब्बीसवें वर्ष में पूरी तरह घर वापसी और परिवार की ख़राब आर्थिक स्थिति के कारण सरकारी जूनियर हाईस्कूल में शिक्षक की नौकरी।

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