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Description
न रहूं किसी का दस्तनिगर
यह किताब भारतीय समाज और उसकी सभ्यता के एक हज़ार वर्षों के परिवर्तनों का संक्षिप्त मगर जीवन्त दस्तावेज़ है। इस किताब में राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान रही धाराओं ख़ासकर नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के कांग्रेस छोड़ने और ‘आज़ाद हिन्द फौज़’ का गठन कर देश की आज़ादी के लिए लड़ी गई लड़ाई का ज़िक्र विस्तार से किया गया है। साथ ही यह भी बताया गया है कि ‘आज़ाद हिन्द फौज़’ के सिपाहियों के साथ स्वतंत्र भारत की सरकार ने कैसा बर्ताव और सुलूक किया।
इस किताब में आज़ादी के बाद क़रीब तीन दशकों तक चले समाजवादी आन्दोलन, उसकी टूट, एका और बिखराव का बहुत ही सजीव चित्रण किया गया है। साथ ही इस आन्दोलन में भाग लेनेवाले प्रमुख नेताओं—आचार्य नरेन्द्र देव, डॉ. राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और उनके सहयोगियों के राजनीतिक चरित्र का वस्तुगत वर्णन और विश्लेषण ईमानदारी के साथ किया गया है। एक मायने में यह आत्मकथा इतिहास की उन विकृतियों की ओर इशारा करती है जो अभी भी जनमानस में गहरी पैठ किए हुए हैं और जिनका सुधारा जाना ज़रूरी है।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Hardbound |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2025 |
| Pulisher |











Anas choudhary –
पुस्तक समीक्षा
पुस्तक: न रहूँ किसी का दस्तनिगर
लेखक: कैप्टन अब्बास अली
न रहूँ किसी का दस्तनिगर कैप्टन अब्बास अली की आत्मकथा है, जिसमें उन्होंने अपने जीवन, स्वतंत्रता संग्राम के अनुभवों, भारतीय राष्ट्रीय सेना (आईएनए) में अपनी भूमिका तथा स्वतंत्रता के बाद के सामाजिक और राजनीतिक जीवन का अत्यंत ईमानदारी से वर्णन किया है। यह पुस्तक केवल एक व्यक्ति की जीवन-गाथा नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता संघर्ष और राष्ट्र निर्माण की जीवंत कहानी भी प्रस्तुत करती है।
पुस्तक का शीर्षक ही लेखक के स्वाभिमान और स्वतंत्र विचारों का परिचायक है। “दस्तनिगर” का अर्थ है किसी का आश्रित या अधीन रहना। लेखक अपने पूरे जीवन में सत्य, आत्मसम्मान और स्वतंत्रता के सिद्धांतों पर अडिग रहे। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अपने आदर्शों से समझौता नहीं किया।
इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सरल, प्रभावशाली और आत्मीय भाषा है। लेखक ने अपने अनुभवों को बिना किसी दिखावे के सहज शैली में प्रस्तुत किया है। आज़ादी की लड़ाई, सैनिक जीवन, जेल यात्रा और सामाजिक संघर्षों का वर्णन पाठक को भावनात्मक रूप से जोड़ देता है। पुस्तक पढ़ते समय ऐसा अनुभव होता है मानो लेखक स्वयं अपने जीवन की कहानी सुना रहे हों।
यह पुस्तक केवल इतिहास की जानकारी नहीं देती, बल्कि देशभक्ति, साहस, त्याग, ईमानदारी और आत्मसम्मान जैसे जीवन मूल्यों की भी प्रेरणा देती है। विशेष रूप से युवाओं के लिए यह पुस्तक प्रेरणास्रोत है, क्योंकि यह बताती है कि सच्चे राष्ट्रप्रेम और दृढ़ संकल्प से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।
निष्कर्ष:
न रहूँ किसी का दस्तनिगर एक प्रेरणादायक, ऐतिहासिक और विचारोत्तेजक आत्मकथा है। यह पुस्तक स्वतंत्रता संग्राम के एक सच्चे सेनानी के जीवन को निकट से जानने का अवसर देती है तथा पाठकों में राष्ट्रप्रेम, आत्मसम्मान और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करती है। प्रत्येक विद्यार्थी, शोधार्थी और इतिहास प्रेमी को इस पुस्तक का अध्ययन अवश्य करना चाहिए।