Navdha Bhakti – 2

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Navdha Bhakti – 2

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190.00 180.00

Author: Sriramkinkar Ji Maharaj

Availability: 8 in stock

Pages: 141

Year: 2020

Binding: Paperback

ISBN: 0

Language: Hindi

Publisher: Ramayanam Trust

Description

नवधा भक्ति – 2

प्रथम प्रवचन

भगवान् श्रीरामभद्र और वात्सल्यमयी, करुणामयी माँ श्रीसीताजी की अनुकम्पा से इस वर्ष पुन: यह सुअवसर मिला है कि श्री लक्ष्मीनारायण मन्दिर के पवित्र प्रांगण में जिज्ञासु, श्रद्धालु एवं भावुक श्रोताओं के समझ श्रीरामचरितमानस की कुछ चर्चा की जा सके। यह आयोजन निसन्देह श्रीबसन्तकुमारजी बिरला और सौजन्यमयी श्रीमती सरलाजी बिरला की श्रद्धाभावना और इन पर प्रभु की कृपा का ही परिणाम है।

श्री जाजूजी ने, जो कवि, साहित्यकार, सुधी और बुध भी हैं, मेरी प्रशंसा में जो भावोद्गार प्रकट किए उसके विषय में मैं यही कहूँगा कि इसमें मेरी कोई विशेषता नहीं है। प्रभु मेरे माध्यम से जो बात कहला रहे हैं, यह निश्चित रूप से उनकी अनुकम्पा का ही फल है। अब इसमें यदि ‘जन’ से अधिक बुध को आनन्द आता है, तो यह बात ‘मानस’ में कही गयी है –

जो प्रबंध बुध नहिं आदरहीं।

सो श्रम बादि बाल कवि करहीं।। 1/13/8

अतः उनकी यह भावाभिव्यक्ति तो ‘मानस’ के सन्दर्भ से ही जुड़ी हुई है। और उन्होंने जो कुछ मेरे लिये, माध्यम के रूप में दिखाई देने वाले एक व्यक्ति के लिये कहा, वह उनकी स्नेह-भावना का परिचायक है। मैं इसके लिये उनका आभार प्रकट करता हूँ।

पिछले वर्ष नवधा भक्ति का जो प्रसंग प्रारम्भ किया गया था, इस वर्ष उसी क्रम को आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं।

भगवान् श्रीराम जब भक्तिमती शबरीजी के आश्रम में आते हैं तो भावमयी शबरीजी उनका स्वागत करती हैं, उनके श्रीचरणों को पखारती हैं, उन्हें आसन पर बैठाती हैं और उन्हें रसभरे कन्द-मूल-फल लाकर अर्पित करती हैं। प्रभु बार-बार उन फलों के स्वाद की सराहना करते हुए आनन्दपूर्वक उनका आस्वादन करते हैं। इसके पश्चात् भगवान् राम शबरीजी के समक्ष नवधा भक्ति का स्वरूप प्रकट करते हुए उनसे कहते हैं कि –

नवधा भकति कहउँ तोहि पाहीं।

सावधान सुनु धरु मन माहीं।।

प्रथम भगति संतन्ह कर संगा।

दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।।

गुर पद पकंज सेवा तीसरि भगति अमान।

चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान। 3/35

मन्त्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा।

पंचम भजन सो बेद प्रकासा।।

छठ दम सील बिरति बहु करमा।

निरत निरंतर सज्जन धरमा।

सातवँ सम मोहि मय जग देखा।

मोतें संत अधिक करि लेखा।।

आठवँ जथालाभ संतोषा।

सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा।।

नवम सरल सब सन छलहीना।

मम भरोस हियँ हरष न दीना।। 3/35/1-5

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Binding

Paperback

ISBN

Language

Hindi

Pages

Publishing Year

2020

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