Oohapoh

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Oohapoh

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249.00 189.00

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Author: Ashish Gaur

Availability: 6 in stock

Pages: 132

Year: 2025

Binding: Paperback

ISBN: 9789372512939

Language: Hindi

Publisher: Bodhi Prakashan

Description

ऊहापोह

अपनी बात

क्यों कोई एक नया पाठक, किसी नए लेखक की कविताओं की किताब उठाएँ, जब उसके पास कोई पुख्ता ‘वजह’ ना हो ?

इस सवाल का जवाब एक गहरी दार्शनिक और वैचारिक चिंतन की मांग करता है।

यही सवाल का जवाब आपको 2 स्टाइल में दूंगा। और यही दो सोच मेरी किताब के नाम और उसके उनवान की वजह है।

पहली बात, हमको ये समझना होगा कि साहित्य और कला का मूल स्वरूप ही ये है, कि ये मनुष्यत्व के अंतर अस्तित्व को प्रभावित करती है, एक ऐसे अलौकिक जगत में प्रवेश दिलाती है जहाँ अनुभूति, भावना और विचार अपनी सीमाओं को तोड़ते हैं। जब हम एक नए लेखक की रचनाएँ पढ़ने का फैसला करते हैं, तो हम वस्तुतः अपनी संवेदना के क्षेत्र का विस्तार कर रहे होते हैं। हर रचनाकार एक नए विचार का भुगतान करने वाला है, यह एक ऐसी दृष्टि का प्रस्तुतिकरण है जो सामाजिक प्रवाह से परे है, एक ऐसी आवाज है जो अभी व्यापक रूप से पहचानी नहीं गई है। ये एक आमंत्रण है, एक अंतर्ध्वनि जो हमें नए दृश्य और नए अनुभव तक ले जाने के लिए उद्घोषित होती है।

दार्शनिक रूप से, एक नया लेखक अपने अनुभव को अभिव्यक्ति देने का एक प्रथम प्रयास कर रहा होता है और यह प्रयास उसके लिए एक कठिन मगर मूल वंश व्यवहारिक ध्यान होता है। मूल तत्व से जुड़े पाठक के लिए यह अवसर होता है कि वह अपने विचारों की सीमाओं को, अपने जीवन के समर्थकों को और अपने समाज के सामने आकर एक नई दुनिया को खोजे।

Additional information

Authors

Binding

Paperback

ISBN

Language

Hindi

Pages

Publishing Year

2025

Pulisher

2 reviews for Oohapoh

  1. 4 out of 5

    डॉ पवित्रा सिंह (verified owner)

    ऊहापोह नाम के अनुरूप जब अंदर की जद्दोजहद शब्दों का रूप लेती है तो कविता के रूप में इसी गहराई से उभर कर आती है ….मेरे शब्द सोच का मेरी एक मौन अनावरण जैसे
    नजर मेरी निमकश पर कसा हुआ एक शायद जैसे !
    अभी पढ़ना शुरू ही किया है उम्मीद है आरम्भ से अंत तक शब्दों की यही गहराई मिलेगी एक और कविता वक़्त से बात फिर में बोए ख़्वाब पर काटा अकेलापन मैंने निवाड की खाट पे
    छन्द में चाँद बाँधा मैंने …अद्भुत सुंदरता से शब्दों की गहनता को कविता के रूप में पिरोया है ।

  2. 4 out of 5

    डॉ पवित्रा सिंह (verified owner)

    ऊहापोह नाम के अनुरूप जब अंदर की जद्दोजहद शब्दों का रूप लेती है तो कविता के रूप में इसी गहराई से उभर कर आती है ….मेरे शब्द सोच का मेरी एक मौन अनावरण जैसे
    नजर मेरी निमकश पर कसा हुआ एक शायद जैसे !
    अभी पढ़ना शुरू ही किया है उम्मीद है आरम्भ से अंत तक शब्दों की यही गहराई मिलेगी ।अद्भुत सुंदरता से शब्दों की गहनता को कविता के रूप में पिरोया है ।


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