-16%
Rakhmabai : Stree Adhikar Aur Kanoon
₹400.00 ₹335.00



₹400.00 ₹335.00
₹400.00 ₹335.00
Author: Sudhir Chandra
Pages: 224
Year: 2012
Binding: Hardbound
ISBN: 9788126723379
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
रख्माबाई स्त्री अधिकार और कानून
रख्माबाई के खिलाफ दादाजी के मुकदमे में स्त्रिायों की स्थिति को लेकर एक पूर्वग्रह छिपा हुआ था। इसकी क्रूरता सुनवाई के दौरान कभी-कभार ही उभरकर सामने आई। लेकिन जब आई तो दिखा गई कि एक व्यक्ति के रूप में स्त्री का अपना कोई स्वतंत्रा अस्तित्व नहीं था। ऐसे ही एक अवसर पर, रख्माबाई पर दादाजी के अधिकार का दावा करते हुए वीकाजी ने कहा, ‘पत्नी अपने पति का एक अंग होती है, इसलिए उसे उसके साथ ही रहना चाहिए।’ यह उस तरह की बात थी जिसका मजाक उड़ाकर बेली यूरोपीय श्रेष्ठता से जुड़ा अपना दम्भ जता सकते थे। उन्होंने कहा, ‘आप इस नियम को भावनगर के ठाकुर पर कैसे लागू करेंगे, जिन्होंने राजपूतों की परम्परा के अनुसार एक ही दिन में चार स्त्रियों के साथ विवाह किया ?’
वीकाजी ने बेधड़क जवाब दिया, ‘तो फिर ठाकुर की अस्मिता को चार हिस्सों में विभाजित माना जाएगा।’ हिन्दू कानून की इस व्याख्या पर अदालत में जो अट्टहास हुआ उसे समझा जा सकता है। लेकिन बेली जैसों के इस विश्वास को समझना मुश्किल है कि औरतों के प्रति उनका नज़रिया उस नज़रिए से बेहतर था जिसको लेकर यह अट्टहास हुआ था। ग्रेटना ग्रीन विवाहों की तरह उन्हें यह भी याद होना चाहिए था कि ‘सबसम्पशन’ (सन्निवेश) अंग्रेजी पारिवारिक जीवन की धुरी हुआ करता था। बेली भूल गए थे कि सन्निवेश के इसी सिद्धान्त का एक अवशेष अंग्रेजी कानून की एक महत्त्वपूर्ण मान्यता के रूप में अब भी मौजूद था। इस सिद्धान्त के अनुसार, पत्नी इस सीमा तक अपने पति का अभिन्न अंग थी कि उसे अपने पति के खिलाफ दीवानी अदालत में मुकदमा करने का भी अधिकार नहीं था।
– इसी पुस्तक से
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Hardbound |
| Language | Hindi |
| ISBN | |
| Pages | |
| Publishing Year | 2012 |
| Pulisher |
सुधीर चन्द्र
वर्षों से सुधीर चन्द्र आधुनिक भारतीय सामाजिक चेतना के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करते रहे हैं। राजकमल से ही प्रकाशित—हिन्दू, हिन्दुत्व, हिन्दुस्तान (2003), गाँधी के देश में (2010), गाँधी : एक असम्भव सम्भावना (2011), रख्माबाई : स्त्री, अधिकार और क़ानून (2012), बुरा वक्त अच्छे लोग (2017) के बाद हिन्दी में यह उनकी छठी पुस्तक है।

Reviews
There are no reviews yet.