Sahitya Aur Sahitya Ka Lokvritt Evam Anya Nibandh

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Sahitya Aur Sahitya Ka Lokvritt Evam Anya Nibandh

Sahitya Aur Sahitya Ka Lokvritt Evam Anya Nibandh

375.00 285.00

In stock

375.00 285.00

Author: Dr. Rajkumar

Availability: 5 in stock

Pages: 296

Year: 2025

Binding: Paperback

ISBN: 9789362016263

Language: Hindi

Publisher: Setu Prakashan

Description

साहित्य और साहित्य का लोकवृत्त एवं अन्य निबन्ध

प्रिण्ट संस्कृति का वर्चस्व कायम होने से पहले हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति पठ्य से ज्यादा श्रव्य थी। उसका पाठ या गायन किया जाता था। प्रिण्ट संस्कृति के वर्चस्व के बाद वह पठ्य हो गयी। पठ्य/टेक्सच्युअल संस्कृति ने प्रायः समरूप और एकवचनात्मक संस्कृति को आदर्श रूप में प्रस्तुत किया जबकि वाचिक (performative) संस्कृति प्रायः बहुवचनात्मक और अनेकात्मक होती थी। ज्ञान के अनुशासन के रूप में विश्वविद्यालयों में स्थापित हो जाने के बाद हिन्दी के चरित्र में बहुवचनात्मकता के बचे रहने की सम्भावना क्षीण हो गयी। हिन्दी के इस नवनिर्मित लोकवृत्त से शास्त्रीय-उपशास्त्रीय संगीत, पारसी थिएटर, नौटंकी, फिल्म और जनपदीय भाषाओं/बोलियों को बाहर कर दिया गया। पारम्परिक हिन्दी कवि और श्रोता-समुदाय के लिए भी इस नये वृत्त में कोई जगह नहीं रही।

अब प्रश्न यह है कि हिन्दी के इस नवनिर्मित लोकवृत्त का दायरा पुराने लोकवृत्त से बड़ा था या छोटा ? दूसरा प्रश्न यह है कि हिन्दी का यह नया लोकवृत्त कितना समावेशी था ? ध्यान रहे कि हिन्दी के इस नये लोकवृत्त में उर्दू शामिल नहीं है। क्या यह अकारण है कि मैथिलीशरण गुप्त की ‘भारत भारती’ में भारत के इतिहास से आशय प्रायः हिन्दुओं के इतिहास से है। अब कोई चाहे तो तर्क कर सकता है कि हाली के ‘ मुसद्दस’ में भी तो सिर्फ मुसलमान ही हैं। जो भी हो, भारत भारती में राष्ट्र और हिन्दू समुदाय के बीच विभाजक रेखा बिल्कुल धुँधली है। भारत भारती ही क्यों, वसुधा डालमिया को यदि प्रमाण मानें तो हिन्दू परम्परा का राष्ट्रीयकरण तो भारतेन्दु युग में ही शुरू हो गया था।

राष्ट्र को एक समुदाय से जोड़ने के साथ ही राष्ट्रीय संस्कृति को भी उसी समुदाय की कल्पित संस्कृति का पर्याय बना दिया गया। यही नहीं, इस राष्ट्रीय संस्कृति के ‘स्वर्णयुग’ को अतीत में प्रक्षिप्त कर दिया गया और उस स्वर्णयुग को वापस लाना राष्ट्र का कर्तव्य मान लिया गया। इस राष्ट्र की एक भाषा थी, एक मन था, एक सबका भाव था। सम्पूर्ण भारत मानो एक नगरी थी। यह शान्तिप्रिय भारत था। सिर्फ आत्मरक्षा के लिए यहाँ हिंसा का सहारा लिया जाता था। स्पर्धा और संघर्ष का यहाँ अभाव था। भारतीय अतीत की यह छवि सिर्फ मैथिलीशरण गुप्त की रचनाओं में ही नहीं, प्रसाद और निराला की कई रचनाओं में भी दिखाई पड़ जाती है। यह भारत की समावेशी छवि नहीं है। इस छवि में अन्य सदा के लिए पराया या विदेशी होने के लिए अभिशप्त है।

– इसी पुस्तक से

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Paperback

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Language

Hindi

Pages

Publishing Year

2025

Pulisher

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