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Description
सुरंग के उस पार
छत्तीसगढ़ के लेखकों ने साहित्य की हर विधा में उल्लेखनीय काम किया है। इस अंचल के कथाकार कहानियों की दुनिया में अपने विशिष्ट अन्दाज़ और विषय के लिए देश भर में सम्मान पाते हैं। परदेशीराम वर्मा कथा-क्षेत्र के महत्त्वपूर्ण लेखक हैं। उनका जन्म देश को आज़ादी मिलने के लगभग माह भर पूर्व हुआ। दुर्ग जिले के एक गाँव लिमतरा के किसान परिवार में जन्मे परदेशीराम वर्मा ने अपनी पीढ़ी के उल्लेखनीय कथाकार के रूप में यश प्राप्त किया। उनकी कहानियों में छत्तीसगढ़ के गाँव अपनी समग्र विशेषताओं के साथ पहली बार आये। मूल रूप से कहानी और उपन्यास विधाओं में रमने वाले परदेशीराम वर्मा का अपना छत्तीसगढ़ अंचल प्रतिरोध और संघर्ष का पक्षधर है। शोषण की चक्की में पिसकर भी उनकी कहानियों के लोग साथ और सहयोग की ताक़त से भरा-पूरा जीवन जीते हैं। कबीर, गुरु बाबा घासीदास और गांधी का छत्तीसगढ़ में जो गहरा प्रभाव है, वह परदेशीराम की कहानियों और उपन्यासों में झलकता है। वे हिन्दी कहानी के संसार में छत्तीसगढ़ का सबल प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए वे राष्ट्रीय फ़लक पर देदीप्यमान हैं।
‘सुरंग’ के उस पार अपने आत्मबल के दम पर अँधेरे से उजाले की ओर चलते हुए बार-बार लहूलुहान होकर भी हिम्मत नहीं हारने वाले व्यक्ति की आत्मकथा है।
इस आत्मकथा में लगभग पचहत्तर वर्षों का इतिहास समाहित है। बदल रहे छत्तीसगढ़ के विविध रंगों के साथ ही इस अँचल में देश के अन्य प्रान्तों से आकर धीरे-धीरे इसे अपना बना लेने वालों की रोचक, मनोरंजक कहानियाँ पहली बार पाठक के सामने नये रूप में सामने आती हैं।
परदेशीराम वर्मा अठारह वर्ष की उम्र में असम राइफ़ल्स के सिपाही बनकर नागालैंड मिज़ो हिल्स चले गये। वे मात्र तीन वर्ष ही वहाँ रहे मगर इन तीन वर्षों में ही देश भर के लोगों को क़रीब से जानने का उन्हें भरपूर अवसर मिला।
उनके गाँव के पास ही भिलाई इस्पात संयन्त्र विकसित हुआ। छुटपन से भिलाई को देखने-समझने का अवसर उन्हें मिला। छत्तीसगढ़ एक तरफ़ अपने इस बड़े कारखाने के कारण देश-विदेशों में चर्चित है तो दूसरी ओर आदिवासी अंचल में नक्सल समस्या और विकास की धीमी गति के कारण भी इस प्रदेश की ओर शुभचिन्तकों का ध्यान जाता है। इन अनुभवों को परदेशीराम वर्मा ने अपनी कहानियों और उपन्यासों में बहुत प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया है।
पृथक् छत्तीसगढ़ आन्दोलन के महत्त्वपूर्ण नायकों के साथ जुड़कर उन्हें काम करने का अवसर मिला। उन्हें सन्तोष है कि धीरज के साथ लगातार संघर्ष करने वाले छत्तीसगढ़ियों ने अपना पृथक् राज्य पाया। मगर यह दुःख भी है कि छत्तीसगढ़ी भाषा को यहाँ भरपूर सम्मान उस तरह नहीं मिला, जिस तरह देश के अन्य प्रान्तों में वहाँ की भाषाओं को मिल रहा है। इस अंचल के घने वनों में रहने वाले आदिवासियों ने सदैव स्वाभिमान के साथ अभाव में जीते हुए अपनी भाषा, संस्कृति और कला का मान बढ़ाया है।
यहाँ के जंगलों में नक्सल समस्या क्यों है, इस प्रश्न का उत्तर छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से दिया है। परदेशीराम वर्मा की कृतियों में भी इस प्रश्न के उत्तर हैं।
उन्हें भरोसा है कि सुरंग के उस पार चमकते हुए सूरज की रोशनी होगी। धीरज से उस पार पहुँचा जा सकता है। यह विश्वास इस आत्मकथा को पढ़कर पाठकों को भी होगा।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Hardbound |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2025 |
| Pulisher |











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