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Description
ताकि सनद रहे : आपालकाल में लोकसभा
आपातकाल यानी जून 1975 में देश में लगायी गयी इमरजेंसी को लेकर परस्पर विरोधी दृष्टिकोण से चर्चा व बहस का सिलसिला निरन्तर बना रहा है। तत्कालीन सत्तापक्ष और उसके राजनीतिक वारिस जहाँ आपातस्थिति की घोषणा को एक समय विशेष की ऐतिहासिक अनिवार्यता बताते रहे हैं वहीं प्रतिपक्ष उसे लोकतन्त्र का हनन करार देता आया है। जाहिर है एक पक्ष ने इसे अपवाद माना, तो दूसरे पक्ष ने विचलन। लेकिन यह किताब ‘…ताकि सनद रहे : लोकसभा में आपातकाल’ उपर्युक्त दोनों दृष्टिकोणों में से किसी का भी प्रतिनिधित्व नहीं करती। यह बस पृष्ठभूमि और सन्दर्भ बताते हुए एक ऐतिहासिक विवरण पेश करती है; और वह यह कि आपातस्थिति घोषित होने के बाद लोकसभा में उस बारे में क्या बहस हुई थी। उस अवधि की लोकसभा की कार्यवाही पढ़ते हुए आपातकाल को लेकर सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष की सारी दलीलें हमारे सामने आ जाती हैं और देश-दुनिया के तत्कालीन हालात का भी कुछ अन्दाजा होता है। भारत के राजनीतिक इतिहास के इस बेहद विवादित कालखण्ड के वस्तुगत मूल्यांकन में जिनकी रुचि हो उनके लिए खासतौर से पक्ष-विपक्ष, दोनों तरफ से दिये गये वक्तव्यों और सारे तर्कों-प्रतितौं से गुजरना, उनपर गौर करना जरूरी हो जाता है। आपातकाल पर अनेक किताबें लिखी गयी हैं जिनमें अपने-अपने संस्मरण, अपनी-अपनी कहानियाँ और अपना-अपना पक्ष-पोषण है। लेकिन यह किताब न कोई वृत्तान्त है न विश्लेषण। यह एक दस्तावेज है जो सभी के काम आ सकता है, चाहे उनका राजनीतिक या विचारधारात्मक रुझान कुछ भी हो। ऐतिहासिक महत्त्व की इस सामग्री को जुटाने का जतन किया है इतिहास के अध्येता राजगोपाल सिंह वर्मा ने। परिशिष्ट में आपातस्थिति के सम्बन्ध में तत्कालीन राष्ट्रपति की उद्घोषणा और राष्ट्र के नाम तत्कालीन प्रधानमन्त्री के सन्देश को संकलित करके उन्होंने इस किताब को दस्तावेजी लिहाज से और भी अहम बना दिया है। आशा की जानी चाहिए कि उनका यह उद्यम सार्थक और स्वागतयोग्य माना जाएगा।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2025 |
| Pulisher |











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