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तीन रंग लोक के
भारतीय समाज और नाट्य कला
भारतीय समाज और परंपरा में लोक जीवन की शक्ति सदैव ही मूलाधार रही है। यही वह संजीवनी है जिसकी वजह से अनेकानेक आक्रमणों, व्याधियों और बाधाओं के बाद भी हमारी संस्कृति अक्षुण्ण रही है। भारतीय सांस्कृतिक स्वरूप की सही पहचान यहां के लोक जीवन में नहीं समाई है। लोक की उक्तियां, लोक के गीत, संगीत और नाट्य इस संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं।
भारतीय नाट्य जगत में लोकनाट्य कभी प्रत्यक्ष तो कभी छाया के रूप में सदैव मौजूद रहे हैं। गांव गुवाड़ से लेकर मंच तक हर कहीं इनकी मौजूदगी महसूस की जा सकती है। लोकनाट्य या लोककला के संदर्भ सामाजिक, धार्मिक या परंपरा के निर्वहन के हो सकते हैं। क्षेत्र या प्रांत के अनुसार लोकजीवन के मूल्य इस कला का हिस्सा होते जाते हैं। इसे यूं भी कह सकते हैं कि किसी क्षेत्र की संस्कृति को समझना हो तो वहां की लोककला, लोकनाट्य के जरिये समूचा समझा जा सकता है। जनजीवन के जो पहलू पर्यटकीय दृष्टि से दिखाई नहीं देते, वे यहां बहुत स्पष्ट दीख जाते हैं। यही वह सूत्र भी है जो एक से दूसरे क्षेत्र में समता भी दिखलाता है। भाषा की भिन्नता, वेषभूषा के अलग होने तथा परंपराओं की विशिष्टता के बावजूद अन्य संस्कृतियों के साथ जुड़ाव के संकेत लोक कला में समाए दिखते हैं। ओडिशा और पश्चिम बंगाल की जात्रा लगभग इसी नाम से राजस्थान के कई क्षेत्रों में जानी जाती है।
यात्री को जात्री या जातरू कहा जाता है जो किसी धार्मिक प्रयोजन से यात्रा करता है। रामलीला और रासलीला उत्तर भारत के लगभग सभी प्रांतों में और देश के अन्य प्रांतों में भी अलग-अलग रूप और शैलियों में मंचित होती है। कथा समान, प्रस्तुति स्थान अनुसार। स्वांग, नौटंकी, तमाशा, गवरी, रम्मत, भवाई आदि कुछ नाम हैं जो लोकनाट्य में लगभग पूरे देश में और कई बार देश से बाहर भी जाने व पहचाने जाते हैं।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2025 |
| Pulisher |











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