Vajud Aur Parchhain : Atamkatha

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Vajud Aur Parchhain : Atamkatha

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Author: Dilip Kumar

Availability: 3 in stock

Pages: 422

Year: 2017

Binding: Paperback

ISBN: 9789386799685

Language: Hindi

Publisher: Vani Prakashan

Description

वजूद और परछाई : आत्मकथा

दिलीप कुमार (युसूफ ख़ान), जिन्होंने हिन्दी सिनेमा में 1940 के दशक में एक नौसिखिया के रूप में शुरुआत की, ने बहुत ही कम समय में स्टारडम (नायकत्व) के शिखर को छुआ। अपने 60 वर्ष के लम्बे फ़िल्मी कैरियर में उन्होंने अपनी रचनात्मक योग्यता, दृढ़ निश्चय, मेहनत और अनोखे अन्दाज़ से एक के बाद एक हिट फ़िल्मों में मन्त्रमुग्ध कर देने वाला प्रदर्शन किया। इनकी नकल करने वाले असंख्य हैं, लेकिन वास्तविक तो केवल एक ही है जिसने अपने समय का भरपूर आनन्द लिया है।

इस अनूठी पुस्तक में दिलीप कुमार की जन्म से लेकर अब तक की जीवन-यात्रा का वर्णन किया गया है। इस प्रक्रिया में उन्होंने स्पष्ट रूप से अपनी बातचीत और सम्बन्धों-जो व्यापक स्तर पर विविध लोगों से रहे हैं और इनमें केवल पारिवारिक ही नहीं, अपितु फ़िल्मी दुनिया से जुडे़ लोगों के साथ-साथ राजनीतिज्ञ भी शामिल हैं- का स्पष्ट रूप से विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। वह अनुभव करते हैं कि उनके बारे में जो बहुत कुछ लिखा जा चुका है, वह मिथ्या और भ्रामक है। वह स्पष्ट रूप से बताते हैं कि उन्होंने कैसे सायरा बानो से शादी की, जो कि एक परीकथा की तरह है।

दिलीप कुमार उस घटना के बारे में बताते हैं, जिससे उनकी ज़िन्दगी बदल गयी : बॉम्बे टॉकीज़ की देविका रानी से उनकी मुलाक़ात होना और उनके द्वारा उन्हें फ़िल्म में अभिनय का आमन्त्रण दिया जाना। उनकी फ़िल्म ‘ज्वार भाटा’ (1944) थी। वह विस्तारपूर्वक बताते हैं कि उन्हें किस प्रकार सीखना पड़ा और कैसे उन्होंने अपना अभिनय-सम्बन्धी अन्दाज़ बनाया जिसने उन्हें अपने समकालीनों से बिल्कुल अलग कर दिया। इसके बाद उनकी फ़िल्मों, जैसे- ‘जुगनू’, ‘शहीद’, ‘मेला’, ‘अन्दाज़’, ‘दीदार’, ‘दाग़’ और ‘देवदास’ के साथ-साथ उनका क़द भी बढ़ता गया। इन फ़िल्मों में उन्होंने बड़ी तेज़ी से ‘ट्रेजेडियन’ के रूप में भूमिका निभाई, जिससे उनकी मानसिकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। उन्होंने एक ब्रिटिश (अंग्रेज़) मनोचिकित्सक से परामर्श किया, जिसने उन्हें हास्य-व्यंग्य की भूमिका निभाने की सलाह दी। फ़िल्म ‘आज़ाद’ और ‘कोहिनूर’ के अलावा ‘नया दौर’ में किया गया उनका हास्य से भरपूर अभिनय प्रभावशाली रहा। तब उन्होंने अनेक फ़िल्मों, जैसे-  ‘गंगा-जमना’, ‘लीडर’, ‘दिल दिया दर्द लिया’, ‘राम और श्याम’, ‘आदमी’, ‘संघर्ष’, ‘गोपी’, ‘सगीना’ और ‘बैराग’ आदि में गम्भीर और दिल गुदगुदाने वाले किरदार निभाए।

आगे चलकर उन्होंने फ़िल्मों से पाँच वर्ष का विराम लिया और फिर अपनी दूसरी पारी ‘क्रान्ति’ (1981) से शुरू की, जिसके बाद वे अनेक हिट फ़िल्मों में दिखाई दिये, जैसे- विधाता’, ‘शक्ति’, ‘मशाल’, ‘कर्मा’, ‘सौदागर’ और ‘क़िला’।

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Paperback

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Language

Hindi

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Publishing Year

2017

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