Maithili Sharan Gupt : Prasangikta Ke Antahsutra

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Maithili Sharan Gupt : Prasangikta Ke Antahsutra

Maithili Sharan Gupt : Prasangikta Ke Antahsutra

395.00 295.00

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Author: Krishnadatta Paliwal

Availability: 5 in stock

Pages: 160

Year: 2018

Binding: Hardbound

ISBN: 9788181432018

Language: Hindi

Publisher: Vani Prakashan

Description

मैथिली शरण गुप्त : प्रासंगिकता के अन्तःसूत्र

मैथिलीशरण गुप्त के सृजन-कर्म में हमारी परम्परा के पुरखे बोलते हैं। कवि का समूचा युग-परिवेश काव्य-संवेदना में अधिकाधिक एकाग्र होकर भिद जाता है। बीसवीं शताब्दी के भारतीय लोकजागरण को गुप्त जी का संघर्षशील व्यक्तित्व और इतिहास-बोध सृजनात्मकता में मूल स्रोत पर ही पकड़ने के लिए संकल्पबद्ध है। वह हमारी जातीय स्मृति के एक बहुत बड़े अंश को रचनात्मकता और काव्यात्मकता में ढाल लेते हैं। शायद इसीलिए अपने से बाद के कवियों के लिए वे प्रेरणा और चुनौती दोनों रहे हैं। हम पाते हैं कि हमारे जातीय-सांस्कृतिक इतिहास की प्रखर वैष्णव-चेतना गुप्त जी में नये आलोक के साथ प्रस्फुटित हुई है। उस पर भारतीयता का वह गहरा रंग है-जो प्रादेशिकता को पछाड़कर विकसित होती रही है। निश्चय ही गुप्त जी ने अतीत का गौरवगान किया है, किन्तु वे अतीतजीवी नहीं हैं। उनकी सृजनात्मकता में अतीत इस तरह स्पन्दित और सृजित है-मानो वह वर्तमान ही हो। उनमें अतीत के माध्यम से वर्तमान के. साक्षात्कार की क्षमता जन्मजात थी। आधुनिक भारतीय स्वाधीनता-संग्राम की हर जीवन्त धड़कन को उनकी कविता ने वाणी दी है। वर्तमान के लगभग सभी आन्दोलनों को पचाने की प्रक्रिया इतनी दीर्घ और अनवरत रही है कि यह चौकन्नापन आश्चर्य में डाल देता है। मेरे वे मित्र जो गुप्त जी को ‘हिन्दू राष्ट्रवाद के गायक कवि’ तथा ‘नेहरू-युग के सरकारी कवि गुप्त’ सिद्ध करना चाहते हैं – उनकी ‘समझ’ पर मुझे गहरा सन्देह है। ऐसी स्थिति में इस पुस्तक के निबन्ध गुप्त जी को सही सन्दर्भों और दिशाओं में सोचने-समझने की आरम्भिक भूमिका मात्र हैं। इनमें वह समीक्षात्मक शास्त्रार्थ नहीं है- जो कलह-कर्म को ही समीक्षा माने बैठा है। इन निबन्धों में तो कवि के लेखक की प्रासंगिकता और रचनात्मक उपलब्धि  को टटोलने की ही तैयारी है।

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Hardbound

Language

Hindi

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Publishing Year

2018

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