Sumati Saxena Lal

Sumati Saxena Lal

सुमति सक्सेना लाल

लखनऊ के एक महाविद्यालय ‘नारी शिक्षा निकेतन’ में सैंतीस वर्षों तक दर्शन शास्त्र पढ़ाने के बाद अब आज़ाद हैं। सन् 1969 में धर्मयुग में पहली कहानी छपी थी। उसके बाद पाँच वर्षों तक निरन्तर धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, सारिका आदि पत्रिकाओं में कहानियाँ छपती रहीं। फिर अनायास ही लेखन में तीस वर्षो का लम्बा व्यवधान आया। इतने वर्षों के बीच में सिर्फ़ एक कहानी 1981 में साप्ताहिक हिन्दुस्तान में दूसरी शुरुआत नाम से छपी थी। चर्चित कथाकार महीप सिंह जी के द्वारा सम्पादित कहानी-संग्रह 1981 की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ संग्रह में इस कहानी को सम्मिलित किया गया था। सन् 2004 से अनायास पुनः लिखने और छपने का सिलसिला शुरू हुआ। नया ज्ञानोदय, हंस, कथादेश, समकालीन भारतीय साहित्य, आदि सभी प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में कहानियाँ छपी हैं। अनेक कहानियों का मराठी और अंग्रेज़ी आदि भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है। सन् 2006 में भारतीय ज्ञानपीठ से कहानी-संग्रह अलग अलग दीवारें, और पैंगुइन यात्रा बुक्स से दूसरी शुरुआत नाम से एक कहानी संग्रह 2007 में प्रकाशन के लिए स्वीकृत हुआ था जो 2009 और 2011 में छपे।

सन् 2013 में सामयिक बुक्स से होने से न होने तक नाम से एक उपन्यास छप चुका है। नवम्बर 2019 में सामयिक से ही एक उपन्यास फिर… और फिर शीर्षक से बाज़ार में आया है। 2018 में अमन प्रकाशन से ठाकुर दरवाज़ा नाम से उपन्यास आया है। अनेक कहानियों के साथ ही होने से न होने तक उपन्यास का मराठी भाषा में अनुवाद हो चुका है।

मो. : 9558812148

ई-मेल : sumati1944@gmail.com

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