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अस्तोदय
देशद्रोह और देशप्रेम के ऐसे परिवेश के मध्य सूर्या की यातनाओं की अन्तिम रात भी जब खत्म हो गयी थी और चटगाँव की कहानी भी, तब उपन्यासकार अपनी विश्लेषणात्मक और चित्रात्मक प्रवृत्ति के सहारे उपन्यास के शीर्षक को कथा नायक के यथानाम तथा कर्म की भाँति उभारता है। इस माने में कि- ”सूर्य जब भी अस्ताचल में होता है तो क्षितिज की तरफ से वह धरातल के नीचे ही जाता प्रतीत होता है। समुद्र की गहराई में जाती सूर्या की पार्थिव देह भी उसी तरह प्रतीत हो रही थी मानो आज वह सूर्या भी अस्त हो रहा था। लेकिन सूर्य अस्त होने का अर्थ ही फर सूर्य का उदय होना है। यह अस्त होने की क्रिया ही भविष्य के सूर्योदय की आधारशिला रखती है। गुलाम भारत में इस तरह के असंख्य क्रांति के सूर्य अस्त हुए तब जाकर सूर्या के बलिदान के तेरह साल बाद अंतत: आज़ादी के सूरज का उदय हो पाया। इसलिए आज़ादी के इस प्रथम सूर्योदय को मिला कर आज़ाद भारत में आने वाले हज़ारों वर्षों तक होने वाले सूर्योदय मिल कर भी $गुलाम भारत के उन लाखों लाख क्रांति के सूर्यास्तों का ऋण नहीं चुका पाएंगे। यदि हम सूरज के उदय होने को ही आज़ादी कह दें तो यह आज़ादी का पूर्ण अर्थ नहीं होगा, उदय के पूर्व के अस्त ही इस आज़ादी को पूर्णता प्रदान करेंगे। अत: इस आज़ादी का पर्याय सूर्य उदय नहीं बल्कि सूर्य अस्तोदय है…।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2024 |
| Pulisher |











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