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Bharat : Hamein Kya Sikha Sakta Hai ?
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₹250.00 ₹190.00
₹250.00 ₹190.00
Author: Max Muller
Pages: 174
Year: 2021
Binding: Paperback
ISBN: 9789389577167
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
भारत : हमें क्या सिखा सकता है ?
भारतीय साहित्य और संस्कृति पर मैक्स मूलर के अगाध ज्ञान को देखते हुए इंग्लैंड की सरकार ने उन्हें 1882 में आई.सी.एस. पास हुए अंग्रेज युवकों के प्रशिक्षण के दौरान भारतीय धर्म, साहित्य और संस्कृति पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया, ताकि ये भावी प्रशासक भारत की आत्मा को उचित ढंग से समझ सकें। इस अवसर पर प्रो. मैक्स मूलर ने सात व्याख्यान दिए जिन्हें बाद में पुस्तक के रूप में 1882 में ही प्रकाशित कर दिया गया। यह पुस्तक उसी का अनुवाद है। इन व्याख्यानों में उन्होंने बताया कि भारतीय समाज को पश्चिम से कमतर समझना भूल है। उन्होंने वेदों और यहाँ के पुराख्यानों की व्याख्या करते हुए बताया कि ये सब हिन्दुओं की जीवन-प्रणाली के प्राण हैं। आज भी उनके ये व्याख्यान भारतीय अस्मिता और प्रज्ञा को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। इन व्याख्यानों में वे क्रमश: भारत की भौगोलिक सम्पन्नता, सांस्कृतिक विविधता, चारित्रिक जटिलता और धार्मिकता पर अपने गहन अध्ययन की रोशनी में प्रकाश डालते हैं। वे बताते हैं कि नृतत्त्वशास्त्रियों, भाषाशास्त्रियों, इतिहासकारों, समाजशास्त्रियों और धार्मिक चिन्तकों के लिए भारत में कितना कुछ है, जिस पर वे काम कर सकते हैं।
एक पूरा व्याख्यान इस श्रृंखला में उन्होंने सिर्फ इस धारणा को निरस्त करने के लिए दिया जिसके अनुसार भारत के हिन्दू लोगों में सत्य के प्रति सम्मान नहीं है। इस पूर्वग्रह के विरुद्ध उन्होंने अनेक विद्वानों के मन्तव्य देते हुए और कई ग्रंथों के उदाहरण देते हुए सिद्ध किया कि ऐसा नहीं है। मैक्स मूलर को लेकर एक नकारात्मक विचार उस धारा के साथ भी चलता है जिसमें मैकाले के अंग्रेजी को लेकर किए गए प्रयासों को एक साजिश करार दिया जाता है, तो भी यह जानने के लिए कि मैक्स मूलर स्वयं भारत और भारतीय संस्कृति के बारे में क्या सोचते थे, यह पुस्तक एक अनिवार्य पाठ है।
| Authors | |
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| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2021 |
| Pulisher |
मैक्स मूलर
फ्ऱेडरिक मैक्स मूलर का जन्म जर्मनी के डेसाउ नगर में 1823 ईस्वी में हुआ था। उन्होंने 18 वर्ष की आयु में लीपजिग विश्वविद्यालय में संस्कृत का अध्ययन शुरू कर दिया और 1843 में बीस वर्ष की आयु में स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण करने के एक साल बाद ही ‘हितोपदेश’ का जर्मन भाषा में अनुवाद प्रकाशित करा दिया। इसके बाद तो संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों के अनुवादों का सिलसिला शुरू हो गया। ‘कठोपनिषद्’ और ‘केनोपनिषद्’ का जर्मन भाषा में अनुवाद करने के बाद उन्होंने ‘मेघदूत’ का जर्मन भाषा में पद्यानुवाद किया।
1846 में मैक्स मूलर लन्दन के इंडिया हाउस में सुरक्षित प्राचीन पांडुलिपियों से अपनी पांडुलिपियों का मिलान करने के लिए आए।

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