Description
चलते रहे रात भर
राकेश मिश्र की कविताएँ दैनिक जीवन में प्रयुक्त साधारण बिम्बों के द्वारा मानवीय संघर्ष की तस्वीरें खींचती हैं। कविता की छोटी-छोटी पंक्तियों में वे सामाजिक विसंगतियों एवं निरावृत सत्य का एक पूरा परिदृश्य अंकित करते हैं। इस दृष्टि से ‘रोटियाँ’ शीर्षक कविता विशेष रूप से चिन्तनीय बन पड़ी है—’बाँध दो/सूखी रोटियाँ/कँटीले तारों से/पोत दो/मक्खन/सूखी रोटियाँ/नंगी हों/तो/दस्तावेज़ होती हैं/हमारी बेईमान आदमीयत की’। इस तरह मिश्र जी मनुष्य के मूलभूत संघर्ष, दु:ख-दर्द और उसकी नियति की सही पहचान रखते हैं। वे अपने आस-पास की सारी जानी हुई चीज़ों को बिलकुल साफ़-सुथरे और विश्वसनीय ढंग से व्यंजित करते हैं। इस ढंग की कविताओं में ‘नारे’, ‘चुप होती आवाज़’, ‘हेलीकॉप्टर’, ‘कंक्रीट की दीवारें’, ‘आख़िर कब तक’, ‘उदास बच्चे’, ‘चलते रहे रात-भर’, ‘कृष्ण विवर’, ‘तस्वीर’, ‘चौराहा’, ‘शहर में रातें’, ‘खिलारी’, ‘गुरुजी’, ‘शहर’, ‘भूख’ तथा ‘वह लड़की’ का समावेश किया जा सकता है। इससे यह माना जा सकता है कि मिश्र जी के लिए कविता सिर्फ़ कला-यात्रा नहीं है। वह सामाजिक दायित्वों को सजगता के साथ सम्पादित करने की विधा है।
—पुरोवाक् से
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