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Description
गरीबजादे
भारतीय समाज और व्यवस्था की नब्ज़ को जिस गहराई से एक कथाकार के रूप में राजू शर्मा समझते हैं, वह हिन्दी कथा परिदृश्य में विरल है। हलफनामे, विसर्जन, पीरनवाज, ऐ मेरे वतन, मतिभ्रम आदि तमाम उपन्यासों में उनके जिस व्यापक पर्यवेक्षण और गहन दृष्टि का ज्ञान होता है, उसी का विस्तार उनके इस नये उपन्यास में है। आम आदमी सत्ता की चक्की में जिस क्रूरता से पीसा जाता है उसे ग़रीबज्जादे में बहुत गहराई से देखा जा सकता है। इसमें वर्णन की ख़ूबी यह है कि न सत्ता इकहरी है और न जनता का शोषण एकांगी है। इस बहुस्तरीय सत्ता और शोषण की परतों को लेखक ने गहरे औपन्यासिक भूगोल में विन्यस्त किया है। इसका एक सिरा अगर समाज में धँसा है तो दूसरा सिरा उनके अपने ही उपन्यास हलफनामे में। इस कारण यह उपन्यास कला की दृष्टि से गहराई और विस्तार दोनों प्राप्त कर सका है।
आशा है कि इनके पिछले उपन्यासों की तरह इस उपन्यास का भी हिन्दी पाठक स्वागत करेगा।
Additional information
| ISBN | |
|---|---|
| Authors | |
| Binding | Paperback |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2025 |
| Pulisher |











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