Ghaggar Nadi Ke Tapoo

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Ghaggar Nadi Ke Tapoo

Ghaggar Nadi Ke Tapoo

149.00 112.00

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149.00 112.00

Author: Surendra Sundaram

Availability: 5 in stock

Pages: 92

Year: 2024

Binding: Paperback

ISBN: 9789355369222

Language: Hindi

Publisher: Bodhi Prakashan

Description

घग्घर नदी के टापू

कहानी के बहाने बतियाना

मेरे लिए कहानी आत्मा से उलझ-पुलझ कर अपनी मौलिक स्वतंत्रता को बनाए व बचाए रखने की जिद्द है। इस छीनाझपटी में लेन-देन करके कुछ हासिल नहीं होता। बस भीड़ में कूद पड़ो, सब ढा-ढूककर अपने निजत्व को ले भागो। फिर इसी निजत्व को चुनौतियों के झंझावतों के सामने खुला छोड़कर किसी प्रमाणिक विश्वास को पा जाने की प्रतीक्षा करो। अगर मेरा अपनापन छोटा है तो मुझे कहानी कभी बड़प्पन नहीं दिला सकती। शब्द अगर बीज रूप हैं तो उन्हें जीवन-सौन्दर्य के परिष्कृत जल से सींचना ही पड़ेगा।

हिन्दी कहानी ने अपने विकास की अनथक यात्रा में हर दौर को देखा है। हमारे चितचढ़े कहानीकारों की सूची लम्बी है। सभी ने एक ही राग गाया है, एक ही पीर पर रो-रोकर समय गुजारा है। ना राग छूटा, ना पीर मिटी। मेरे देश की आत्मा ने पंचायत से लेकर संसद तक अपने चिथड़ेपन को बार-बार उघाड़ा है, परन्तु किसी की आँख में ना शर्म है, ना पानी, बस लुंजपुंज घिघियाते नारे हैं, जिनके अर्थ ढूंढते-ढूंढते एक पीढ़ी कब्र में लटक गई है।

कहानी में मेरे आदर्श प्रेमचंद हैं, क्यों हैं- इसका उत्तर मेरी कहानियां ही बेहतर ढंग से दे पाएंगी। मैं तो सिर्फ यही कहना चाहता हूँ कि, “हमने इस आजादी को किसलिए पाया क्या 77 सालों बाद राजपथ पर खड़े होकर मुझे ये कहने का हक संविधान देता है कि मैं जी पाने में अक्षम हूँ, मुझे मरने का अधिकार मिलना चाहिए ? नहीं ! इससे हमारी बहुत सारी मान्यताएं खण्डित हो सकती हैं, क्योंकि आजादी है सबको भूखे मरते रहने की, बीमारी में सड़ने की, कतार में खड़े रहकर भजन गाते रहने की पर जीने के लिए अपने पाँव फैलाने की जब-जब भी कोशिश की गई तो पाँव कभी न्याय के मन्दिर से टकराए तो कभी सिर संसद से जा टकराया।

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Authors

Binding

Paperback

ISBN

Language

Hindi

Pages

Publishing Year

2024

Pulisher

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