Hindi Aalochana Ke Naye Vaicharik Sarokar
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हिन्दी आलोचना के नये वैचारिक सरोकार
उत्तर-आधुनिकतावाद, उत्तर-संरचनावाद के वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हमें अपने काव्यशास्त्र की जड़ों की ओर लौटने का सुअवसर मिल रहा है। हम मिशेल फूको के विमर्श-सिद्धान्त तथा देरिदा के ‘विरचनावाद’ आदि के सन्दर्भ से उनके साहित्य-चिन्तन को टटोल सकते हैं। विश्वभर में हो रही थ्योरी-केन्द्रित बहस से कतराने की जरूरत नहीं है। अपने को बार-बार जाँचने-परखने, जानने का समय साहित्य-सिद्धान्तों के क्षेत्र में हमें मिला है-उसका उपयोग करना चाहिए।
यह पुस्तक विद्वानों के लिए नहीं है और न अतिरिक्त ज्ञान-दम्भ में निमग्न शास्त्र-जड़ता का रोना रोनेवालों के लिए है। हर देश और काल का पाठक शास्त्र की जड़ता का अतिक्रमण करके ही गतिशील जीवन-यथार्थ का साक्षात्कार करता रहा है और अब तो ‘पाठकवादी आलोचना’ का जमाना है। रामचन्द्र शुक्ल और अज्ञेय, रिचर्ड्स और नार्थोप फ्राई तो पाठकवादी-आलोचना के अग्रदूत कहे जा सकते हैं। फिर हम भारतीयों ने रस-मीमांसा में अर्थ-मीमांसा (भाष्य-विज्ञान) को सदैव आदर से अपनाया है।
Additional information
| ISBN | |
|---|---|
| Authors | |
| Binding | Hardbound |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2021 |
| Pulisher |











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