Description
कहानी : अनुभव और अभिव्यक्ति
कहानी पर आलोचना की यह पुस्तक चार भागों में विभक्त है। पहले भाग में साहित्य और कहानी की समझ को लिया गया है। इसमें साहित्य की लेखकीय पहचान और प्रासंगिकता जैसे प्रश्नों को अपने ढंग से समझने और सँवारने का प्रयास किया गया है।
दूसरे भाग में हिन्दी कहानी की यात्रा के भिन्न पड़ाव हैं, मोड़ हैं और भविष्य के संकेत हैं। राजेन्द्रजी प्रेमचन्द की विरासत से अपनी बात शुरू करते हैं और नयी कहानी जैसे कथा-आन्दोलनों से गुजरते हुए वर्तमान तक पहुँचते हैं।
तीसरे भाग में कुछ कहानीकारों के लेखन की सार्थकता की पहचान है। अपनी पहचान भी इसमें शामिल है। मूल्यांकन कम अन्वेषण ज्यादा है। खाली-पीली फैसला सुनाने की बजाय राजेन्द्रजी बात की तह में जाना अधिक पसन्द करते हैं और इसमें काफी निर्मम हो जाते हैं।
चौथे भाग में कुछ टिप्पणियाँ हैं । जिनमें प्रेम कहानी, व्यक्तिवादी कहानी जैसे कठघरों से बाहर आकर एक “फ्री स्टाइल” कोशिश की गयी है-छोटी-छोटी घटनाओं, मुद्दों, चुनाव की समस्याओं के आधार पर कहानी की नब्ज़ पकड़ने की।
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