Manas Manthan-5 (Vibhishan Sharanagati)

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Manas Manthan-5 (Vibhishan Sharanagati)

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Author: Sriramkinkar Ji Maharaj

Availability: 5 in stock

Pages: 192

Year: 2014

Binding: Paperback

ISBN: 0000000000000

Language: Hindi

Publisher: Ramayanam Trust

Description

मानस मंथन-5 (विभीषण शरणागति)

प्रथम प्रवचन

एहि विधि करत सप्रेम विचारा

आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा।।

कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा।

जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा।।

ताहि राखि कपीस पहिं आए।

समाचार सब ताहि सुनाए।।

कह सुग्रीव सुनहु रघुराई।

आवा मिलन दशानन भाई।

कह प्रभु सखा बूझिए काहा।

कहइ कपीस सुनहु नर नाहा।

जानि न जाई निसाचर माया।

कामरूप केहि कारन आया।।

भेद हमार लेन सठ आवा।

राखिअ बांधि मोहि अस भावा।।

 सखा नीति तुम नीकि विचारी।

मम पन सरनागत भयभारी।।

सुनि प्रभु वचन हरष हनुमाना।

सरनागत बच्छल  भगवाना।।

सरनागत कहुं जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।

ते नर पाँवर पापमय तिन्हहि बिलोकित हानि।।

आइए अब एक समय के लिए एकाग्र और शान्तचित्त से मानस की उस पंक्ति पर विचार करें जिसमें गुरु वसिष्ठ भगवान् राम के व्यक्तित्व की समग्रता की ओर इंगित करते हैं। वस्तुतः श्रीरामचरितमानस में भगवान श्रीराम के व्यक्तित्व को जिस रूप में प्रस्तुत किया गया है उसे हृदयंगम करने के लिए उस विरोधाभास की ओर दृष्टि डालनी होगी जहाँ वे दो भिन्न रूपों में हमारे समक्ष आते हैं। एक ओर मानस में जहाँ उनकी ईश्वरत्व का प्रतिपादन बार-बार किया गया है, वहीं पर यह बात भी बार-बार दुहराई गयी है कि वे अपने चरित्र में नरलीला प्रस्तुत करते हैं। अतः एक ओर जहाँ वे साक्षात ईश्वर हैं, और इस दृष्टि से वे अतर्क्य और मन, बुद्धि, वाणी से परे प्रतीत होते हैं वहीं वे मानवीय रूप में ऐसा आदर्श चरित्र प्रस्तुत करते हैं जो हमारे लिए पूरी तरह अनुकरणीय है-

राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी।

मत हमार अस सुनहि सयानी।। 1/120/3

कहकर जहाँ भगवान् शंकर उनकी ईश्वरता की ओर इंगित करते हैं वहीं ‘चरित करत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु।’ के रूप में दोनों ही पक्षों को प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार एक रूप में यदि वे आराध्य हैं। तो दूसरे रूप में वे अनुकरणीय हैं।

गुरु वसिष्ठ ने भी भगवान् राम के चरित्र के इन दोनों ही पक्षों को चित्रकूट में प्रस्तुत किया है। एक गुरु के रूप में वे श्रीराम के व्यक्तित्व की बड़ी ही सार्थक समीक्षा प्रस्तुत करते हैं। उनकी वह पक्ति है-

नीति प्रीति परमारथ स्वारथ।

कोउ न राम सम जान जथारथ।। 2/253/5

इसमें गुरु वसिष्ठ भगवान् राम की बड़ी विलक्षण सराहना करते हैं। इस चौपाई के सरल अर्थ से सम्भवतः आप लोग परिचित ही होंगे, और वह यह है कि नीति, प्रीति, परमार्थ और स्वार्थ इसको जितने यथार्थ रूप में श्रीराम जानते हैं उतना जानने वाला कोई अन्य नहीं है। सचमुच जब भगवान् श्री राम के विराट् व्यक्तित्व पर विचार करें, और उनके चरित्र में नीति, प्रीति, परमार्थ और स्वार्थ का कैसा अनोखा सामञ्जस्य है इस पर दृष्टि डालें, तो यह स्पष्ट प्रतीत होने लगता है कि भगवान् श्रीराम का चरित्र अद्वितीय क्यों है ?

हमारे इतिहास के वे सर्वश्रेष्ठ पुरुष क्यों हैं ? अगर आप श्रीरामचरितमानस में भगवान् राम के अवतार के पहले की परिस्थिति पर विचार करें तो एक बात आपके सामने आती है। भगवान् राम का जब अवतार हुआ उस समय ऐसा नहीं था कि इस देश में अन्य महापुरुष नहीं थे। श्रेष्ठ चरित्र वाले व्यक्तियों का अभाव रहा हो ऐसी कोई भी बात नहीं थी। भगवान् श्रीराघवेन्द्र जब अवतरित होते हैं उसके पहले विश्वामित्र जैसे महान् ऋषि थे, वसिष्ठ जैसे ब्रह्मर्षि थे, जनक जैसे तत्त्वज्ञ थे, दशरथ जैसे कुशल शासक थे, बालि जैसे योद्धा थे और इतना ही नहीं इन सबसे बढ़ कर हमारी मान्यता में भगवान् परशुराम जैसा एक महान् शक्तिशाली व्यक्तित्व विद्यमान था। पर इतने महापुरुषों के होते हुए भी श्रीराम की आवश्यकता क्यों हुई ? भगवान् श्री राम के अवतार की पृष्ठभूमि क्या है ? जिस समय वे अवतरित होते हैं उस समय विश्व में इतने महापुरुष थे, इतने योग्य व्यक्ति थे, पर इतने महापुरुषों के होते हुए भी इनमें से किसी को भी हम पूर्ण पुरुष की संज्ञा नहीं दे सकते। ये व्यक्तित्व यदि पूर्ण नहीं थे तो वह कौन-सी कमी थी और भगवान् श्रीराम ने अवतार लेकर किस तरह से उस अभाव को पूर्ण किया ? इस पंक्ति के आधार पर इसी पर विचार करेंगे।

रामचरितमानस के प्रारम्भ में एक पृष्ठभूमि प्रस्तुत की गयी है। पहली बात यह है कि उस समय दो ऐसे अनोखे पात्र हैं जो परस्पर विरोधी हैं, यद्यपि इनके नामों में बड़ी समानता है। ये दोनों पात्र हैं महाराजश्री ‘दशरथ’ और लंकाधिपति ‘दशमुख’। इन दोनों के नामों में जो समानता है उस पर आपकी दृष्टि गयी होगी। इनमें ‘दश’ शब्द तो दोनों के नाम में समान रूप से जुड़ा हुआ है केवल ‘दश’ के बाद अगला शब्द दोनों में बदला हुआ है। इनमें से एक अयोध्या में शासन कर रहा है, और दूसरा लंका में। उसके साथ-साथ एक बड़ी अटपटी-सी बात कही गयी है जिस पर पढ़ने वालों का ध्यान कभी-कभी जाता है। महाराजश्री दशरथ के लिए कहा गया है कि वे चक्रवर्ती सम्राट् थे। ‘ससुर चक्कवय कौसलराऊ’ कहकर महाराजश्री दशरथ के चक्रवर्तित्व की ओर इंगित किया गया। चक्रवर्ती का तात्पर्य है कि सारे विश्व के राजाओं ने जिसे अपने से श्रेष्ठ स्वीकार किया हो। जिसने सब पर विजय प्राप्त कर ली हो वह चक्रवर्ती राजा है। परन्तु दूसरी ओर ठीक यही शब्द रावण के लिए भी रामचरितमानस में कहा गया-

मंडलीक मनि रावन राज करइ निज मंत्र। 1/182

और

ब्रह्मसृष्टि जहँ लगि तनुधारी।

दसमुख बसबर्ती नर नारी।।

सारे संसार पर रावण का शासन था। यह पढ़ करके बड़ा विचित्र-सा प्रतीत होता है कि क्या एक ही समय में दो व्यक्तियों का शासन विश्व पर हो सकता है ? भई ! या तो यह कहा जाता कि उस समय विश्व के सर्वश्रेष्ठ सम्राट, दशरथ थे या कहा जाता कि उस समय विश्व का सम्राट रावण था, दसमुख था। पर दोनों के लिए एक ही शब्द का प्रयोग बड़ा अटपटा-सा लगता है। पर जब आप इसमें गहराई से पैठ कर और इसे मनुष्य के अन्तर्जीवन से जोड़ करके इस पर विचार करेंगे तो आपको लगेगा कि यह कि सत्य केवल त्रेतायुग का ही सत्य नहीं है बल्कि यह हमारे, आपके और सबके जीवन का सत्य है।

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Paperback

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Language

Hindi

Pages

Publishing Year

2014

Pulisher

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