

Manush Janam Anoop

Manush Janam Anoop
₹995.00 ₹700.00
₹995.00 ₹700.00
Author: Prabhakaran Hebbar Illath
Pages: 376
Year: 2026
Binding: Hardbound
ISBN: 9789377379629
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
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Description
मानुष जनम अनूप
मानवीयता अपने आप में मानव के अंतस का उजालापन है, संकीर्णता का विरोधी है, प्रेम के देदीप्यमान रूप का अभिधान है। यही मनुजता जीवन के सौंदर्यात्मक स्वरूप को विकीर्ण करती है। जीवन की सुंदरता जब अमानवीयता के प्रसार से कलंकित हो जाती है तो कबीर प्रेम का मशाल जलाते हैं। मध्यकालीन कवियों की विशेषता यही रही है कि उन्होंने मानवता को अपने धर्म के रूप में स्वीकार किया, जिसके सहारे मानव-मानव के बीच मैत्री की ज्योति जलाई। इसी मानवता के बल पर मध्यकालीन भक्त कवि समाज के सदस्यों की जीवंत समस्याओं को संबोधित करते रहे। इसलिए मुक्तिबोध भक्ति-काव्य पर विचार करते हुए कहते हैं कि “समूचे भक्ति आंदोलन के मूल में जनता का दुख-दर्द ही है और उन दुख-दर्दों को बड़ी जीवंत मानवीयता के साथ उभारने, उनसे एकमेक होकर सामने आने में ही भक्ति आंदोलन की शक्ति को देखा जा सकता है।” कबीर सरीखे कवियों ने कथनी और करनी की अभेदता दिखाई-सिखाई और जीवन में परहित धर्म के महत्व को इस अंदाज़ में दर्शाया कि भेद की दीवारें ढहती गईं। जो दुर्दम पाखंड अपने समय में दिखे, उनके मुखौटों को वे निर्मम होकर चीर-फाड़ करते रहे। अंधेरे में कबीर रोशनी बने। उसके बल पर जनता के मानस में अथक आत्म-विश्वास एवं स्थैर्य जाग्रत किए। “ऐसे थे कबीर! सिर से पैर तक मस्तमौला, स्वभाव से फक्कड़, आदत से अक्कड़, भक्त के सामने निरीह, भेषधारी के आगे प्रचंड, दिल के साफ़, दिमाग से दुरुस्त, भीतर से कोमल, बाहर से कठोर, जन्म से अस्पृश्य, कर्म से वंदनीय। वे जो कुछ कहते थे, अनुभव के आधार पर कहते थे। इसलिए उनकी उक्तियां बेधनेवाली और व्यंग्य चोट करने वाली होती थीं।” संत मलूकदास इसलिए कबीर के बारे में कहते हैं कि “हमारा सद्गुरु विरले जाने।”
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| Authors | |
|---|---|
| Binding | Hardbound |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2026 |
| Pulisher |









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