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Description
मई आत्महत्याओं का मौसम नहीं
“मेरी माँ की रोटियाँ गोल नहीं होती थीं, पर उनकी थकान का व्याकरण और पानी की लिपि मेरे बहुत काम आई।
कवि प्रेम को ताप की तरह सहते हैं और अनिद्रा के गर्भ में बो देते हैं अपने शब्द। कविता की प्रतीक्षा भी कवि के शब्दकोश को समृद्ध करती है।”
— अनुराधा सिंह
मई आत्महत्याओं का मौसम नहीं अनुराधा सिंह की गद्य और गद्य-कविताओं का ऐसा संग्रह है जिसमें प्रेम, स्मृति, स्त्री-अनुभव, देह, अकेलापन, प्रतीक्षा, मृत्यु, प्रकृति और जीवन के छोटे-बड़े अनुभव एक-दूसरे में घुलते हुए दिखाई देते हैं।
इन रचनाओं में प्रेम कोई एकरेखीय भाव नहीं है। वह कभी प्रतीक्षा है, कभी अनुपस्थिति, कभी देह की स्मृति, कभी बेचैनी और कभी ऐसी अनुभूति जिसे शब्दों में बाँधना संभव नहीं। प्रेम यहाँ केवल उसके सुख में नहीं, बल्कि उसकी असुविधा, उसकी विडंबना और उसके भीतर छिपे अकेलेपन में भी दिखाई देता है।
अनुराधा सिंह की रचनाओं की एक विशेषता यह है कि वे जीवन की साधारण-सी वस्तुओं और स्थितियों में असाधारण अर्थ खोज लेती हैं। चाय के दो कप, किसी शहर की यात्रा, अस्पताल का गलियारा, किताबों से भरी हुई शय्या, माँ की थकान, पानी, जंगल, आग और पलाश—इन सबके बीच से मनुष्य के निजी और सामूहिक जीवन की अनेक परतें खुलती हैं।
स्त्री-अनुभव इस संग्रह में किसी घोषणापत्र की तरह नहीं आता। वह प्रेम, देह, रिश्तों, स्मृति और रोज़मर्रा के जीवन के भीतर से अपनी आवाज़ बनाता है। स्त्री यहाँ केवल किसी संबंध की पात्र नहीं, बल्कि अपने अनुभव को देखने और उसका अर्थ तय करने वाली स्वतंत्र चेतना है।
कविता और जीवन के संबंध पर भी यह संग्रह लगातार विचार करता है। कविता यहाँ केवल लिखी जाने वाली चीज़ नहीं, बल्कि जी जाने वाली बेचैनी है। प्रेम, प्रतीक्षा और असफलता जिस तरह शब्दों को जन्म देते हैं, उसी तरह कविता भी जीवन को नए ढंग से देखने की दृष्टि देती है।
संग्रह की रचनाओं में मृत्यु और जीवन का संबंध भी बार-बार उभरता है। विनाश के बाद बची हुई स्मृति, जंगल की आग के बाद फूटते पलाश और राख से निकलती नई हरियाली की तरह यहाँ टूटन के भीतर भी पुनर्सृजन की संभावना मौजूद रहती है।
अनुराधा सिंह की कविता पर विष्णु खरे ने लिखा है :
“अनुराधा सिंह को पढ़ने के बाद मैं कह सकता हूँ कि वह अपने पहले संग्रह से ही आज की समूची महिला-पुरुष-हिंदी कविता में अपनी जगह बना चुकी हैं। उनकी रचनाएँ इतनी उम्दा हैं कि यकबारगी विश्वास नहीं होता कि वाकई ऐसी कविताएँ लिखी जा रही हैं और आप उन्हें पढ़ रहे हैं। उनकी ख़ूबियों पर एक लम्बी समीक्षा अनिवार्य हो चुकी है। हिंदी में उन जैसी स्त्री-पुरुष प्रतिभाओं की नूतन उपस्थिति से कम-से-कम मुझे अत्यधिक हर्ष और फ़ख़्र होता है, कविता में निरंतर नई ज़िंदगी, उम्मीद और प्रेरणा आती रहती हैं।”
— विष्णु खरे
मई आत्महत्याओं का मौसम नहीं ऐसी रचनाओं का संग्रह है जहाँ निजी और सार्वजनिक, प्रेम और अकेलापन, स्मृति और विस्मृति, मृत्यु और जीवन एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। इसकी भाषा आत्मीय भी है और बेचैन भी; वह पाठक को किसी निष्कर्ष तक पहुँचाने के बजाय उसके भीतर कुछ देर तक ठहरी रहती है। और शायद इसीलिए इस पुस्तक का शीर्षक भी अपने भीतर एक गहरी जीवन-दृष्टि रखता है—मई आत्महत्याओं का मौसम नहीं।
यह जीवन से मुँह मोड़ने के बजाय, उसके कठिन और अँधेरे क्षणों में भी प्रेम, स्मृति, कविता और पुनर्सृजन की बची हुई संभावना को देखने वाली किताब है।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2026 |
| Pulisher |











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