

Name Plate

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₹80.00 ₹68.00
₹80.00 ₹68.00
Author: Kshama Sharma
Pages: 163
Year: 2006
Binding: Paperback
ISBN: 9788126719358
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
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Description
नेम प्लेट
क्षमा शर्मा की 28 कहानियों का यह संग्रह स्त्री की दुनिया के जितने आयामों को खोलता है, उसके जितने सम्भवतम रूपों को दिखाता है, स्त्री के बारे में जितने मिथों और धारणाओं को तोड़ता है, ऐसा कम ही कहानीकारों के कहानी-संग्रहों में देखने को मिलता है।
क्षमा शर्मा हिन्दी लेखकों की आम आदत के विपरीत अपेक्षया छोटी कहानियाँ लिखती हैं जो अपने आप में सुखद हैं। उनकी लगभग हर कहानी स्त्री-पात्र के आसपास घूमती ज़रूर है मगर क्षमा शर्मा उस किस्म के स्त्रीवाद का शिकार नहीं हैं जिसमें स्त्री की समस्याओं के सारे हल सरलतापूर्वक पुरुष को गाली देकर ढूँढ़ लिए जाते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि वह पुरुषों या पुरुष वर्चस्ववाद को बख़्शती हैं, उसकी मलामत वे ज़रूर करती हैं और ख़ूब करती हैं, मगर उनकी तमाम कहानियों से यह स्पष्ट है कि उनके एजेंडे में स्त्री की तकलीफ़ें, उसके संघर्ष और हिम्मत से स्थितियों का मुक़ाबला करने की उसकी ताक़त को उभारना ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है।
वह इस मिथ को तोड़ती हैं कि सौतेली माँ, असली माँ से हर हालत में कम होती है या एक विधुर बूढ़े के साथ एक युवा स्त्री के सम्बन्धों में वह प्यार और चिन्ता नहीं हो सकती, जो कि समान वय के पुरुष के साथ होती है। वह देह पर स्त्री के अधिकार की वकालत करती हैं और किसी विशेष परिस्थिति में उसे बेचकर कमाने के विरुद्ध कोई नैतिकतावादी रवैया नहीं अपनातीं। उनकी कहानियों में लड़कियाँ हैं तो बूढ़ी औरतें भी हैं, दमन की शिकार वे औरतें हैं जो एक दिन चुपचाप मर जाती हैं तो वे भी हैं जो कि लगातार संघर्ष करती हैं लेकिन स्त्री की दुनिया के अनेक रूपों को हमारे सामने रखनेवाली ये कहानियाँ किसी और दुनिया की कहानियाँ नहीं लगतीं, हमारी अपनी इसी दुनिया की लगती हैं बल्कि लगती ही नहीं, हैं
भी।
इनके पात्र हमारे आसपास, हमारे अपने घरों में मिलते हैं। बस हमारी कठिनाई यह है कि हम उन्हें इस तरह देखना नहीं चाहते, देख नहीं पाते, जिस प्रकार क्षमा शर्मा हमें दिखाती हैं और एक बार जब हम उन्हें इस तरह देखना सीख जाते हैं तो फिर वे एक अलग व्यक्ति, एक अलग शख़्सियत नज़र आती हैं और हम स्त्री के बारे में सामान्य क़िस्म की उन सरल अवधारणाओं से जूझने लगते हैं जिन्हें हमने बचपन से अब तक प्रयत्नपूर्वक पाला है, संस्कारित किया है। क्षमा शर्मा की कहानियों की यह सबसे बड़ी ताक़त है, उनकी भाषा और शैली की पुख़्तगी के अलावा।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2006 |
| Pulisher |









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