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Description
राड़ा
भाऊ पाध्ये सृजनात्मकता के मुक्त विकास के लिए जरूरी लेकिन वर्जित मानी गयी कई बातें कहने का साहस आखिर तक करते रहे हैं- सफलता की परवाह किये बिना। इसलिए सभी नये लेखक उनका आदर करते हैं।
‘वासूनाका’, ‘वैतागवाड़ी’, ‘बॅ. अनिरुद्ध धोपेश्वरकर’, ‘अग्रेसर’ जैसे एक के बाद एक छपे उपन्यासों के जरिये, भाऊ पाध्ये ने कथा शैली का उच्चतम प्रतिमान स्थापित किया है।
‘राड़ा’ एक ऐसे युवक पर केन्द्रित लघु उपन्यास है, जो हमारी महानगरीय औद्योगिक दुनिया में अपनी सहजता खो चुका है। आर्थिक विकास के चलते सतही तरक्कीपसन्द भोगवादी वर्ग के परिवार में रिश्ते कनकने होते जाते हैं। ऐसे शहरी सम्बन्धों के अनेक उदाहरण भाऊ पाध्ये को पता थे। इस दबाव में बिगड़ी युवा पीढ़ी का उन्हें जबरदस्त अहसास था और यही अहसास उनके लगभग सभी कहानी-उपन्यासों की जड़ों में नजर आता है।
युवाओं की सृजनशीलता इस महानगरीय माहौल में कैसे अपने आप विकृत रूप धारण करती जाती है, यही’ राड़ा’ का केन्द्र बिन्दु है।
– भालचन्द्र नेमाड़े
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2025 |
| Pulisher |











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