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Description
सन्धिनी
प्रस्तुत संग्रह ‘सन्धिनी’में मेरे कुछ गीत संगृहीत हैं। काल-प्रवाह का वर्षों में फैला हुआ चौड़ा पाट उन्हें एक-दूसरे से दूर और दूरतम की स्थिति दे देता है। परन्तु मेरे विचार में उनकी स्थिति एक नदी-तट से प्रवाहित दीपों के समान है। दीपदान के दीपकों में कुछ, जल की कम गहरी मन्थरता के कारण उसी तट पर ठहर जाते हैं, कुछ समीर के झोंके से उत्पन्न तरंग-भंगिमा में पड़कर दूसरे तट की दिशा में बह चलते हैं और कुछ मँझधार की तरंगाकुलता के साथ किसी अव्यक्त क्षितिज की ओर बढ़ते रहते हैं। परन्तु दीपकों की इन सापेक्ष दूरियों पर दीपदान देनेवाले की मंगलाशा सूक्ष्म अन्तरिक्ष-मण्डल के समान फैलकर उन्हें अपनी अलक्ष्य छाया में एक रखती है। मेरे गीतों पर भी मेरी एक आस्था की छाया है। मनुष्य की आस्था की कसौटी काल का क्षण नहीं बन सकता, क्योंकि वह तो काल पर मनुष्य का स्वनिर्मित सीमावतरण है।
वस्तुतः उनकी कसौटी क्षणों की अटूट संसृति से बना काल का अजस्र प्रवाह ही रहेगा। ‘सन्धिनी’नाम साधना के क्षेत्र से सम्बन्ध रखने के कारण बिखरी अनुभूतियों की एकता का संकेत भी दे सकता है और व्यष्टिगत चेतना का समष्टिगत चेतना में संक्रमण भी व्यंजित कर सकेगा ।
– महादेवी
पंक्ति-क्रम
| 1 | निशा को, धो देता राकेश | 23 | ||
| 2 | वे मुस्काते फूल, नहीं | 25 | ||
| 3 | छाया की आँखमिचौनी | 27 | ||
| 4 | इस एक बूँद आँसू में | 29 | ||
| 5 | जिस दिन नीरव तारों से | 31 | ||
| 6 | मधुरिमा के, मधु के अवतार | 34 | ||
| 7 | जो तुम आ जाते एक बार | 36 | ||
| 8 | चुभते ही तेरा अरुण बान | 37 | ||
| 9 | शून्यता में निद्रा की बन | 39 | ||
| 10 | रजत-रश्मियों की छाया में धूमिल घन-सा वह आता | 42 | ||
| 11 | कुमुद-दल से वेदना के दाग को | 44 | ||
| 12 | स्मित तुम्हारी से छलक यह ज्योत्स्ना अम्लान | 4 | ||
| 13 | इन आँखों ने देखी न राह कहीं | 48 | ||
| 14 | दिया क्यों जीवन का वरदान | 50 | ||
| 15 | कह दे माँ क्या अब देखूँ | 51 | ||
| 16 | तुम हो विधु के बिम्ब और मैं | 54 | ||
| 17 | प्रिय इन नयनों का अश्रु-नीर | 59 | ||
| 18 | धीरे-धीरे उतर क्षितिज से | 60 | ||
| 19 | पुलक-पुलक उर, सिहर-सिहर तन | 62 | ||
| 20 | कौन तुम मेरे हृदय में | 64 | ||
| 21 | विरह का जलजात जीवन, विरह का जलजात | 66 | ||
| 22 | बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ | 67 | ||
| 23 | मधुर-मधुर मेरे दीपक जल | 69 | ||
| 24 | टूट गया वह दर्पण निर्मम | 72 | ||
| 25 | मुस्काता संकेत-भरा नभ | 74 | ||
| 26 | झरते नित लोचन मेरे हों | 76 | ||
| 27 | लाये कौन संदेश नये घन | 78 | ||
| 28 | प्राणपिक प्रिय-नाम रे कह | 80 | ||
| 29 | क्या पूजन क्या अर्चन रे | 82 | ||
| 30 | जाग बेसुध जाग | 83 | ||
| 31 | प्रिय ! सान्धय गगन | 84 | ||
| 32 | रागभीनी तू सजनि निश्वास भी तेरे रँगीले | 86 | ||
| 33 | जाने किस जीवन की सुधि ले | 88 | ||
| 34 | शून्य मन्दिर में बनूँगी आज मैं प्रतिमा तुम्हारी | 89 | ||
| 35 | शलभ मैं शापमय वर हूँ | 90 | ||
| 36 | मैं सजग चिर साधना ले | 92 | ||
| 37 | मैं नीर भरी दुख की बदली | 93 | ||
| 38 | फिर विकल हैं प्राण मेरे | 95 | ||
| 39 | चिर सजग आखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना | 96 | ||
| 40 | कीर का प्रिय आज पिञ्जय खोल दो | 98 | ||
| 41 | क्यों मुझे प्रिय हों न बन्धन | 100 | ||
| 42 | हे चिर महान् | 102 | ||
| 43 | तिमिर में वे पदचिह्न मिले | 104 | ||
| 44 | दीप मेरे जल अकम्पित | 105 | ||
| 45 | पन्थ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला | 107 | ||
| 46 | प्राण हँसकर ले चला जब | 109 | ||
| 47 | सब बुझे दीपक जला लूँ | 111 | ||
| 48 | हुए शूल अक्षत मुझे धूलि चन्दन | 113 | ||
| 49 | कहाँ से आये बादल काले | 115 | ||
| 50 | यह मन्दिर का दीप इसे नीरव जलने दो | 117 | ||
| 51 | तू धूल भरा ही आया | 119 | ||
| 52 | आँसुओं के देश में | 121 | ||
| 53 | मिट चली घटा अधीर | 123 | ||
| 54 | अलि कहाँ सन्देश भेजूँ | 125 | ||
| 55 | सब आँखों के आँसू उजले सबके सपनों में सत्य पला | 126 | ||
| 56 | क्यों अश्रु न हों श्रृंगार मुझे | 128 | ||
| 57 | पथ मेरा निर्वाण बन गया | 130 | ||
| 58 | पूछता क्यों शेष कितनी रात | 132 | ||
| 59 | तू भू के प्राणों का शतदल | 133 | ||
| 60 | पुजारी दीप कहीं सोता है | 135 | ||
| 61 | सजल है कितना सवेरा | 137 | ||
| 62 | अलि मैं कण-कण को जान चली | 138 | ||
| 63 | यह विदा वेला | 140 | ||
| 64 | नहीं हलाहल शेष, तरल ज्वाला से अब प्याला भरती हूँ | 144 | ||
| 65 | हे धरा के अमर सुत ! तुमको अशेष प्रणाम | 145 |
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Pages | |
| Publishing Year | 2024 |
| Pulisher | |
| Language | Hindi |











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