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Description
सौ साले पहले चंपारण का गांधी
1917 ई., आज से ‘सौ साल पहले’, सिर्फ चम्पारण के ही इतिहास में नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारतवर्ष के इतिहास के लिए महत्त्वपूर्ण साल है। उस साल ही भारत के इतिहास में सत्याग्रह के पवित्र एवं ज्वलन्त उदाहरण का अनूठा प्रयोग प्रारम्भ हुआ था, जिसने समस्त भारतवर्ष को एक नयी रोशनी दी। इसी रोशनी की डोर थाम महात्मा गाँधी ने चम्पारण सत्याग्रह के जरिए “साँच को आँच नहीं” की पुरानी कहावत की सत्यता को सम्पूर्ण विश्व के लिए उद्घाटित किया।
चम्पारण विजय सत्याग्रह की जीत तो थी ही, साथ-ही-साथ एक अटल विश्वास और निश्छल श्रद्धा की भी विजय थी। जी हाँ, राजकुमार शुक्ल का अखंड विश्वास और उनकी अशेष श्रद्धा ही चम्पारण सत्याग्रह की सफलता की नींव थी।
चम्पारण का यह छोटा-सा किसान सतबरिया के छोटे से गाँव में रहता है, बस लिखना-पढ़ना भर जानता है किन्तु प्रतिदिन अपनी डायरी अवश्य लिखता है। वह निलहे अंग्रेज़ के अत्याचारों के विरुद्ध स्वयं भी संघर्ष करता है और लोगों को अत्याचार के ख़िलाफ़ जाग्रत करता है, भले ही इसके कारण उसपर और उसके परिवार पर मुसीबतों और विपत्तियों का पहाड़ टूटता है।
लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में जाकर तिलक, गाँधी, मालवीय, एनी बेसेंट की उपस्थिति में चम्पारण की व्यथा जब सुनाता है तो ‘शेम-शेम’ की आवाज़ से पंडाल गूंजने लगता है।
‘सौ साल पहले’ उपन्यास के नायक राजकुमार शुक्ल की जीवन्तता महानायक गाँधी के अवतरण के बाद भी बनी रहती है। यह उपन्यास सिर्फ राजकुमार शुक्ल के व्यक्तिगत सुख-दुःख और संघर्ष का दस्तावेज़ ही नहीं बल्कि सौ साल पहले देश और समाज की दशा का दर्पण भी है।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2017 |
| Pulisher |











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