Parishishta

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Author: Giriraj Kishore

Availability: 5 in stock

Pages: 347

Year: 2011

Binding: Paperback

ISBN: 9788126720644

Language: Hindi

Publisher: Rajkamal Prakashan

Description

परिशिष्ट
परिशिष्ट दिनमान (5-11 अगस्त, 1984) के ‘फिलहाल’ स्तम्भ में, ‘परिशिष्ट’ के बारे में गिरिराज किशोर का कथन छपा था, ‘‘अनुसूचित कोई जाति नहीं, मानसिकता है। जिसे अभिजातवर्ग (जिसका वर्चस्व हो) परे ढकेल देता है, वह अनुसूचित हो जाता है।’’ ‘परिशिष्ट’ इसी भयानक मानसिकता को उद्घाटित करनेवाला एक महाअभियोग है। अपने बहुचर्चित उपन्यास ‘यथा प्रस्तावित’ में भी गिरिराज ने इसी वर्ग की दारुण पीड़ा को चित्रित किया था। राष्ट्रीय महत्त्व की महान शिक्षा-संस्थाओं में किसी तरह दाख़िला प्राप्त करनेवाले साधनहीन और तथाकथित जातिहीन छात्रों की त्रासदी, उबलते तेल में डाल दिए जानेवाले व्यक्ति के सन्त्रास की तरह होती है जो पहली बार ‘परिशिष्ट’ के रूप में सामने आई है। राष्ट्रीय स्तर पर ऊँच-नीच और छुआछूत का विष फैला है। आरक्षणवादी नीतियों के बावजूद इनसान को जिस अमानवीय स्थिति का सामना करना पड़ता है, वह हर एक को अपने गिरहबान में मुँह डालकर झाँकने के लिए मजबूर करती है।

उपन्यास से पता चलता है कि लेखक उस सबका अन्तरंग साक्षी है। अपनी मुक्ति की लड़ाई लड़नेवाला हर पात्र एक ऐसे दबाव में जीने के लिए मजबूर है जो या तो उसे मर जाने के लिए बाध्य करता है या फिर संघर्ष को तेज कर देने की खामोश प्रेरणा देता है। यह उपन्यास गिरिराज किशोर की पहचान को ही गहरा नहीं करता बल्कि हिन्दी उपन्यास की परम्परा को समृद्ध भी करता है। एक लड़ाकू जहाज की तरह ऊपर उठते-उठते फट पड़नेवाला, उसी वर्ग का एक पात्र रामउजागर आत्महत्या से पहले नोट लिखकर जेब में रख लेता है कि ‘‘मेरा जाना स्वेच्छा से है। गवेषणात्मक है। हालाँकि उसका प्रतिफल दूसरों को बाँट पाना सम्भव नहीं होगा।…किसी घृणा या शिकायत के कारण नहीं, एक आत्मीयता और आत्म-सन्तोष के कारण मेरा केवल यही प्रश्न है कि जब प्रकृति, जिससे हम सब कुछ पाते हैं, घृणामुक्त है, तो मनुष्य मुक्त क्यों नहीं ?’’… उपन्यास का नायक अनुकूल एक संकल्पशील व्यक्ति है जो सहता है, भोगता है और विचलित नहीं होता। वस्तुतः ‘परिशिष्ट’ सन्त्रास, संघर्ष और संकल्प की महागाथा है।

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Authors

Binding

Paperback

ISBN

Pages

Publishing Year

2011

Pulisher

Language

Hindi

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