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स्त्रीवादी विमर्श : समाज और साहित्य
किसी बुज़ुर्ग के पाँव छुइए और आशीर्वाद पाइए—‘मेरे पूत बने रहें,’ या कि ‘अखंड सौभाग्यवती रहो,’ यानी कि जब मरो तो सुहागिन मरो। यह जीवन का नहीं, मृत्यु का वरदान है। इस प्रकार के वरदानों से हमारा प्राचीन साहित्य भरा पड़ा है। जहाँ एक ओर नायिका–भेद पढ़ाए जाते हैं तो दूसरी ओर स्त्रियों से बचने के तरीक़े। ‘औरत पर कभी भरोसा न करो।’—यह इन महान ग्रन्थों का सूत्र–वाक्य है। स्त्रियों और दलितों से इस समय का समाज इतना आक्रान्त है कि उन्हें पीटने का कोई तरीक़ा नहीं छोड़ता। चूँकि सारे विधान, सारी संहिताएँ, सारे नियम, धर्म, क़ानून पुरुषों ने रचे हैं, इसलिए हर क़ानून, हर रीति–रिवाज और परम्परा का पलड़ा उनके पक्ष में झुका हुआ है। माफ़ कीजिए, साहित्य भी इससे अछूता नहीं है।
एक भारतीय नारी जो त्यागमयी है, सती–सावित्री है, जिसके मुँह में ज़ुबान नहीं है, जो सबसे पहले उठती है, दिन–भर घर की चक्की में पिसती है, सबसे बाद में सोती है, जो कभी शिकायत नहीं करती और इसी के बरक्स एक पश्चिमी नारी जो स्कर्ट पहनती है, सिगरेट पीती है, मर्दों के साथ क्लबों में नाचती है, एक नहीं, बहुत सारे प्रेमी पालती है—इन दो स्टीरियो टाइप में हर कठिन परिस्थिति के बाद भारतीय नारी की विजय होती है और पश्चिमी संस्कृति की प्रतीक नारी या तो किसी की गोली का शिकार होती है अथवा भारतीय नारी अपने पति, जो इस ‘कुलटा’ द्वारा फँसा लिया गया था, के द्वारा झोंटा पकड़कर बाहर निकाल दी जाती है। जितनी दूर तक उसे घसीटा जाता है, उतनी ही दूर और देर तक पश्चिमी संस्कृति पर भारतीय संस्कृति की विजय की तालियाँ आप सुन सकते हैं।
ऐसे ही समाज और साहित्य के विभिन्न आयामों से गुज़रती यह पुस्तक स्त्री-परिदृश्य में एक बड़े विमर्श को जन्म देती है, और कई अनदेखी चीज़ों को देखने की दृष्टि भी। आज के दौर में एक बेहद ही महत्त्वपूर्ण कृति है ‘स्त्रीवादी-विमर्श : समाज और साहित्य’।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Hardbound |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2025 |
| Pulisher |











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