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तुलसी रघुनाथ गाथा
प्रथम अध्याय
पाई न केहि गति पतित पावन राम भजि सुनु सठ मना।
गनिका अजमिल ब्याध गीध गजादि खल तारे घना।।
आभीर जमन किरात खस स्वपचादि अति अघरूप जे।
कहि नाम बारक तेपि पावन होहिं राम नमामि ते।।
रघुबंस भूषन चरित यह नर कहहिं सुनहिं जे गावहीं।
कलिमल मनोमल धोई बिनु श्रम राम धाम सिधावहीं।
सत पंच चौपाई मनोहर जानि जो नर उर धरै।
दारुन अविद्या पंच जनित बिकार श्री रघुबर हरै।।2।।
संदुर सुजान कृपानिधान अनाथ पर कर प्रीति जो।
सो एक राम अकाम हित निर्बानप्रद सम आन को।
जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ।
पायो परमु बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ।।
मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर।
अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु विषम भव भीर।।
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमी दाम।
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम।। (राम.च.मा., 7/130)
प्रभु की रामभद्र की आसीम अनुकम्पा से पुनः इस वर्ष यह सुअवसर मिला है कि आप सब श्रद्धालु श्रोताओं के बीच प्रभु के मंगलमय चरित्र पर कुछ चर्चा की जा सके। गोस्वामीजी का जो दिव्य और उत्कृष्ट चिन्तन है, हम ‘रामचरितमानस’ और तुलसी-साहित्य में उनको ही बार-बार खोजने का यत्न करते हैं।
गोस्वामीजी की यह अलौकिक दृष्टि और उनका ‘दर्शन’ हमें बार-बार अपनी ओर आकृष्ट करता है। अतः तुलसी पञ्चशती-वर्ष के इस अवसर पर हम इसे ही कथा-प्रसंग का केन्द्र बनाकर जो पंक्तियाँ अभी पढी गयी हैं, उन पर एक दृष्टि डालने की चेष्टा करें !
आपने ध्यान दिया होगा, कि अपने आपको साहित्यकार और बुद्धिजीवी मानने वाले अपने लेखन और परिचर्चाओं में ‘कुण्ठा’, ‘सन्त्रास’ आदि कुछ शब्दों को बार-बार दुहराते रहते हैं। इधर कुछ दिनों से जिस एक और शब्द का प्रयोग बढ़ा है, वह शब्द है- ‘प्रासंगिकता’। ‘तुलसीदासजी की प्रासंगिकता क्या है ?’ आदि विषयक लेख और चर्चाएं पढ़ने-सुनने को मिलती रहती हैं। इस वर्ष दिल्ली में आयोजित तुलसी पञ्चशती समारोह मुझे इसलिए भी अच्छा लगा कि वहाँ कई वक्ता बोले पर किसी ने भी ‘तुलसीदास की प्रासंगिकता’ पर प्रश्नचिन्ह लगाने अथवा इस पर वाद-विवाद उठाने की आवश्यकता नहीं समझी !
जब कोई यह प्रश्न करता है कि ‘तुलसी’ की प्रासंगिकता क्या है ?’ अथवा यह सिद्ध करने की चेष्ठा करता है कि ‘तुलसी आज भी प्रासंगिक है’ तो पढ़कर हँसी आती है। क्योंकि जो तुलसी की प्रासंगिकता पर प्रश्न उठाते हैं वे यह नहीं देख पाते कि उनकी स्वयं कोई प्रासंगिकता है भी या नहीं ? और तुलसीदासजी को प्रासंगिक सिद्ध करने वालों से यह पूछें कि देश में कोटि-कोटि व्यक्ति जिनसे प्रेरणा प्राप्त करता है उनकी प्रासंगिकता की घोषणा आप अपनी गोष्ठी में कर देंगे तो क्या लोग आपको धन्यवाद देंगे कि आपने तुलसी को प्रासंगिक मान लिया, बड़ी कृपा की ? गोस्वामीजी को ऐसे किसी प्रमाण-पत्र की आवश्यकता नहीं है। वस्तुतः विचार यह करना कि पाँच सौ वर्ष व्यतीत करने के बाद भी वे इतने प्रासंगिक क्यों हैं ?
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2018 |
| Pulisher |











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