Utsav Ka Pushp Nahin Hoon

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Utsav Ka Pushp Nahin Hoon

Utsav Ka Pushp Nahin Hoon

450.00 340.00

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450.00 340.00

Author: Anuradha Singh

Availability: 4 in stock

Pages: 152

Year: 2023

Binding: Hardbound

ISBN: 9789355185228

Language: Hindi

Publisher: Vani Prakashan

Description

उत्सव का पुष्प नहीं हूँ

अनुराधा की कविताएं अर्द्धनिमीलित आंखों की तरह धीरे-धीरे खुलती है। भीतर का अर्जित प्रकाश बाहर की चकाचौंध से सहज तादात्म्य नहीं बना पा रहा हो तो ऑंखें या कविताएं धीरे-धीरे ही खुलती हैं। आपबीती और जगवीती की विडम्बना कवि को अपने भीतर के गहनतम एकान्त में डुबकी लगवा देती है, उसके बाद जब कवि बाहर आती है, तब गहरे पानियों में समाधिस्थ ही बैठे रह गये नानकदेव की तरह ‘कोई और होकर। दुबारा यहाँ लीटना, जहाँ से धक्के खाकर गये थे, इतना आसान नहीं होता, फिर भी लीटना तो पड़ता है-बस दृष्टि बदल जाती है।

अनुराधा के यहाँ स्टेशन के वेटिंग रूम में गुड़ी-मुड़ी होकर सदियों से सोयी स्त्री ऐसी ही आत्मस्थ स्त्री है- ‘थोड़ा मारा रोय, बहुत मारा सोय’ की कहावत चरितार्थ करती स्त्री। उसकी नींद ही उसकी नानक वाली डुबकी है।

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Authors

Binding

Hardbound

ISBN

Language

Hindi

Pages

Publishing Year

2023

Pulisher

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