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उत्तर आधुनिक समय और मार्क्सवाद
हालाँकि सोवियत संघ के बिखर जाने के बाद बहुत-से लोगों ने यह नारा बुलन्द किया था कि ‘इतिहास का अन्त हो गया है। या मार्क्सवाद मर चुका है, लेकिन जल्द ही जब सोवियत संघ से अलग हुए अनेक गणतन्त्रों में कम्युनिस्ट पार्टी फिर से चुनाव द्वारा सत्ता में आयी और दूसरी ओर एक-ध्रुवीय दुनिया में अमेरिका ने न्यायाधीश से लेकर जल्लाद तक और दारोग़ा से लेकर जेलर तक की भूमिका निभानी शुरू कर दी तो मार्क्स का प्रेत एक बार फिर समूचे पश्चिमी जगत पर मँडराने लगा। उत्तर-आधुनिक समय की अपनी उलझनें और जटिलताएँ तो थीं ही, इस परिदृश्य में पुराने मार्क्सवादी भी एक बार फिर अपने को टटोलने पर विवश हुए।
इस उत्तर-समाजवादी समय में यह द्वन्द्व हर क्षण प्रस्तुत रहता है कि उस मार्क्सवाद का क्या हुआ, उसके ‘समाजवाद’ का क्या बना जो कल तक पूँजीवाद का एक विकल्प मात्र ही नहीं था, बल्कि वह एक पक्का साबुत सहारा, एक ध्रुव था। वह बिला गया, बिखर गया। समाजवादी व्यवस्था चरमरा गयी। पूँजीवादी व्यवस्था और भी दुर्जेय-सी बन कर सक्षम हुई। है। बची समाजवाद व्यवस्थाएँ भी नये पूँजीवाद से घनिष्ठता बढ़ाने लगी हैं। यत्र-तत्र कम्युनिस्ट पार्टियाँ, उनके नेता जो कल तक विश्व के अन्तर्विरोध को यथातथ्य, मुक़म्मल सक्रिय मानते थे और अपनी समझ को हर बार सही सिद्ध करते थे, उनके पास किसी ‘स्ट्रैटेजी’ की जगह टैक्टीकल समझ का सहारा ही बचा नज़र आता है। एक पुख़्ता विचार का इस कदर ढीला हो जाना सबके मन में गहरी टीस पैदा करता है जो उससे। प्रेरणा पाते रहे हैं, और आज भी जिनके दिमाग़ की नसों में मार्क्सवाद की क्लासिकल बिजलियाँ कभी-कभी कौंध पैदा कर जाती हैं। यहाँ दी जा रही पाठ-सामग्री इस व्यथा की कथा है। नये को ढूँढ़ने की कोशिश की है और यह जारी है…
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Hardbound |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2019 |
| Pulisher |











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