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Description
यादों की विरासत
तनहाई की एक दहाई बिता चुकने के बाद मन में अक्सर यह ख़याल आता है, यों अलग और अकेले जी कर क्या किया / जीवन क्या जिया / मेरा ज़िद्दी मन बहस करता है, कहाँ रही तनहा मैं। जितने लोग जीवन में आये सब तो यादों की विरासत बनते गये। जिये हुए को फिर से जीना, स्मृति के गलियारों में टहलना और उनकी बतकही की गूँज काग़ज़ पर पकड़ पाना, चौबीसों घण्टों की व्यस्तता है। रवीन्द्र कालिया की फ़क़ीरी ने प्रयागराज में खूँटा न गाड़ा होता तो कैसे मिलना होता इतने शिष्ट, विशिष्ट, वरिष्ठ रचनाकार साथियों से जिनमें कभी सूर्य की प्रखरता तो कभी चन्द्र की शीतलता मिली। अज्ञेयजी की कही बात बार-बार याद आती है, ‘काल की गति का एक साहित्यिक पक्ष भी है। हमारी स्मृति ही उसका आधार है और रचना का स्रोत है। स्मृति नहीं है तो व्यक्तित्व नहीं है, बल्कि काल भी नहीं है और रचना भी नहीं है।’ इस संग्रह में जिन्हें याद किया है, उनसे न केवल साहित्य का समाज वरन् संस्कृति भी बनती है। वे चले गये लेकिन उनकी पुस्तकें उठाइए या यादें, वे लकदक खड़े हैं अपनी पूरी अदा और अन्दाज़ में।
Additional information
| ISBN | |
|---|---|
| Authors | |
| Binding | Paperback |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2026 |
| Pulisher |











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