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Description
साहित्य और समाज की बात
भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम भर नहीं, जनपदीय साहित्य, संस्कृति एवं सभ्यता की सरणि भी होती है। अपने वैशिष्ट्य से यह मनुष्य की निजता, जनजीवन में प्रचलित विविध कला-रूप एवं उनकी राष्ट्रीयता को भी रूपायित करती है। उन्नत भाषिक व्यवहार से ही किसी जनपद की निजता, तार्किक चेतना और राष्ट्रीयता रेखांकित होती है। भाषा, साहित्य, कला एवं संस्कृति के प्रति नागरिक-अनुराग में ही किसी समृद्ध राष्ट्र की आधुनिकता ध्वनित होती है। भाषा, साहित्य और समाज-तीन खंडों में बँटे ‘साहित्य और समाज की बात’ शीर्षक इस पुस्तक के कुल तैंतीस छोटे-बड़े आलेखों में इस निजता और राष्ट्रीय-पहचान के प्रति नागरिक निरपेक्षता पर चिंतन और चिंता व्यक्त हुई हैं। भारत के सुबुद्ध समाज को इस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2020 |
| Pulisher |











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