Adya Gadya Bindas

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Adya Gadya Bindas

Adya Gadya Bindas

250.00 190.00

In stock

250.00 190.00

Author: Sudhish Pachauri

Availability: 5 in stock

Pages: 136

Year: 2009

Binding: Hardbound

ISBN: 9788181439192

Language: Hindi

Publisher: Vani Prakashan

Description

अद्य गद्य बिन्दास

ठेठ का हिन्दी का ठाठ उसके गद्य में ही नज़र आता रहा है। शुरू दिन से देखिए तो गद्य में भाँति-भाँति की छटाएँ और किसिम-किसिम की पैंतरेबाज़ी दिखती रही है। यही हिन्दी की अपनी विशेषता है, अपना गद्य है। एक टटके नींबू की तरह ज़बान पर अपना स्वाद छोड़ता हुआ, नोक-झोंक से भरा, टाँग खींचू और किसी हद तक पगड़ी उछाल। मगर इसी के साथ हँसी-हँसी में गहरी मार करने वाला, नाविक के तीरों की मानिन्द।

सुधीश पचौरी इस खेल के तपे हुए खिलाड़ी हैं। अपने कलम को कभी हॉकी की तरह तो कभी क्रिकेट के बल्ले की तरह और कभी ठेठ गुल्ली-डण्डे के डण्डे की तरह इस्तेमाल करते हैं। टेना लगाते हैं तो अचूक यानी घाव करे गम्भीर और ऊपर से सोचने के लिए छोड़ दे।

बिन्दास बन्दे हैं तो बिन्दास गद्य नहीं लिखेंगे भला ! यह पुस्तक उनके बिन्दास गद्य का एक नमूना पेश करती है। इस लिहाज़ से यह किताब भानुमती का पिटारा है। नाना प्रकार के व्यंजन, नाना शैलियों में और नाना बर्तनों में परोसे गये हैं।

हिन्दी समाज जिस संचार-संवाद में निरन्तर रहता है, वह बेधड़क और धँसमार वाला है। फँसाव, आपा-धापी, अचानक खुल पड़े नये तरह के विश्व में रातों-रात कुछ कर गुज़रने की लपलपाहट ने साहित्य-संस्कृति के हाथ-पैर जकड़ लिये हैं। हिन्दी के अधिसंख्य रचनाकारों को देखें तो लालच और छटपटाहट, अनुकूलन और प्रतिकूलन की दुरमिसन्धियों, चिर-परिचित नाटकीय गहराई की तलाश में हरेक का किनारे बैठे रह जाना, एक बड़े महावृत्तान्त को न पाने, न बना पाने की क्षत-विक्षत कामनाओं और इस बड़प्पन के आखेट में बेहद क्षुद्र जीवन चर्याओं का एक संसार नज़र आता है !

‘बिन्दास’ ने इस समाज की जितनी ‘ख़बर ली’ है,’ उतनी ‘ख़बर दी’ भी है। इसी चक्कर में अपनी ख़बर भी ले डाली है। अपनी ख़बर लिये बिना दूसरे की ख़बर भला कैसी होती ?

सो मित्रो ! पेश है सुधीश पचौरी रचित ‘अद्य गद्य बिन्दास’ ।

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Authors

Binding

Hardbound

ISBN

Language

Hindi

Pages

Publishing Year

2009

Pulisher

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