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Description
धर्मसार भरत
प्राक्कथन
धर्म के साथ ‘सार’ शब्द का प्रयोग कुछ महानुभावों को अटपटा-सा प्रतीत होता है। उनकी दृष्टि में धर्म स्वयं में ही इतना परिपूर्ण है कि उसके साथ सार शब्द जोड़ देने से यह भ्रांति हो सकती है कि धर्म शास्त्रों में कुछ ऐसा भी है जो निस्सार है। किन्तु गोस्वामी जी धर्मसार शब्द का प्रयोग अनगिनत प्रसंगों में करते हैं। श्री भरत् के सन्दर्भ में गुरु वशिष्ठ के द्वारा प्रयुक्त किए जाने वाला यह शब्द बड़ा ही सांकेतिक है। प्रारम्भ में गुरु वशिष्ठ को ऐसा प्रतीत हुआ था कि भरत की धारणाएँ धर्म शास्त्रों की मान्यताओं से भिन्न हैं इसलिए वे उनके समक्ष विस्तार से वर्ण और आश्रम धर्म का निरूपण करते हैं। उनका उद्देश्य श्री भरत को राजधर्म की दिशा में प्रेरित करना था।
महाराज दशरथ की मृत्यु के पश्चात् जो रिक्तता उत्पन्न हुई थीं। उसकी पूर्ति लोककल्याण के लिए अनिवार्य थी। उनकी दृष्टि में महाराज दशरथ ने भरत को राज्य का उत्तराधिकारी घोषित किया था। अत: पुत्र धर्म पालन करते हुए वे उस पारम्परिक धर्म की रक्षा कर सकते हैं। किन्तु श्री भरत ने उत्तर देते हुए एक अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रश्न प्रस्तुत किया था। क्या राज सिंहासन पर किसी व्यक्ति के आसीन हो जाने मात्र से ही सारी समस्याओं का समाधान हो जाता है ? क्या इतिहास इसका साक्षी नहीं है कि अनेक राजा सिंहासनासीन होकर रक्षक के स्थान पर भक्षक बन गये। पद के मद से उनमत्त होकर प्रजा को उत्पीड़ित किया। नहुष, त्रिशुंक, बेन के रूप में ऐसे कई दृष्टांत सामने आते हैं। इनमें कुछ ऐसे भी थे जो प्रारम्भ में बड़े धार्मिक प्रतीत होते थे। पर राजसत्ता ने उन्हें पथभ्रष्ट बना दिया। इसलिए उन्होंने यह प्रश्न उपस्थित किया कि आप राज्य देते हुए मेरे प्रति उदारता का प्रदर्शन कर रहे हैं या इसका उद्देश्य लोककल्याण और प्रजा का संरक्षण है ? स्वयं इसका भी उत्तर देते हुए वे धर्म के साथ एक नए शब्द का प्रयोग करते हैं-
कहऊँ साँचु अब सुनि पतिआहू।
चाहिअ धरमसील नरनाहू।।
(रामचरित मा. 2-178-1)
शील का तात्पर्य है व्यक्ति का वह गुण जो उनके स्वभाव का अंग बन चुका है और चाहकर भी उसे छोड़ पाना उसके लिए-संभव नहीं है। धर्म यदि ऊपर से आरोपित होगा तो उसे उतार देने या छोड़ देने में कोई कठिनाई नहीं होगी। किन्तु जब वह किसी के स्वभाव का अंग बन जाता है, तब वह इतना अभिन्न हो जाता है कि धर्म का परित्याग कर पाना उसके लिए संभव ही नहीं होता।
अंगद ने व्यंग्यात्मक स्वर में रावण के लिए इस शब्द का प्रयोग किया था-
कह कपि धरम सीलता तोरी।
हमहि सुनि कृत पर त्रिय चोरी।।
वे रावण के द्वारा जगज्जननी के अपहरण का स्मरण कर उसकी धर्मशीलता का उपहास करते हैं। वस्तुत: अधर्म व्यक्ति का स्वभाव बन गया है। अधर्म को धर्म मानने के अभ्यस्त हो चुके हैं। संभवत: गुरु वशिष्ठ ने श्री भरत द्वारा कहे गए इस शब्द पर गम्भीरता से दृष्टि नहीं डाली, परन्तु चित्रकूट पहुँचकर उन्हें इसका अनुभव हुआ, यही नहीं उन्होंने ऐसा भी अनुभव किया कि यह उपाधि भरत के लिए ही सर्वाधिक उपयुक्त है। धर्म का संबंध जहाँ ‘स्व’ से होता है, वही शील की अभिव्यक्ति ‘पर’ के ही संदर्भ में होती है। जहाँ स्वधर्म अपनी निष्ठा की रक्षा के लिए प्रेरित करता है-वहीं शीलवान व्यक्ति को यह चिन्ता बनी रहती है कि किस तरह से पर धर्म की भी रक्षा हो। यही भावना भरत के चरित्र में तब परिलक्षित होती है जब श्री भरत प्रभु के यह कहने पर भी कि ‘तुम जो कहोगे वही मैं करूँगा।’
भरत कहै सो किए भलाई।
अस कहि राम रहे अरगाई।।
परन्तु श्री भरत एक बार भी उनसे लौटने का अनुरोध नहीं करते। गुरु वशिष्ठ इस दृश्य को देख सुनकर कितने चकित हुए होंगे इसकी कल्पना ही की जा सकती है। इसीलिए जब वे चित्रकूट से लौटकर अयोध्या आते हैं और भरत सिंहासन पर प्रभु की पादुकाओं को प्रतिष्ठापित करने का प्रस्ताव गुरु वसिष्ठ के सामने रखते हैं तब वे भावविभोर हो जाते हैं। और उसी प्रसंग में उन्होंने भरत के लिए ‘धर्मसार’ शब्द का प्रयोग किया। उनका यह कथन ‘कि तुम जो समझोगे, जो कहोगे, जो करोगे वही धर्मसार होगा’। उनकी भावनाओं की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति थी-
समुझब कहब करब तुम्ह जोई।
धरम सारु जग होइहि सोई।।
बहुधा व्यक्ति जो समझता है, कभी-कभी उसे कह नहीं पाता, कभी कहकर कर नहीं पाता, यह अंर्तद्वन्द्व सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है ! इसके एक मात्र अपवाद तो उन्हें श्री भरत ही प्रतीत होते हैं।
धर्मसार शब्द से धर्म की महिमा कम नहीं हो जाती अपितु उसे और भी अधिक व्यापकता प्राप्त हो जाती है। स्वधर्म का अतिशय आग्रह पर धर्म का विरोधी भी तो हो सकता है। तब अधर्म और धर्म में टकराहट के स्थान पर, धर्म स्वयं आपस में ही संघर्ष का हेतु बन जाता है। बहुधा इतिहास और समाज में ऐसे अनेक दृष्टांत देखने को मिलते हैं जहाँ धर्म समाज को धारण करने के स्थान पर उसके विघटन का हेतु बन जाता है। यह प्रवृत्ति आज और भी विकृत रूप में परिलक्षित हो रही है। ऐसी स्थिति में धर्मसार भरत वह सूत्र प्रदान करता है जो मानस का महामंत्र है।
महाराज अब कीजिअ सोई।
सब कर धरम सहित हित होई।।
यही रामराज्य की स्थापना का मूल मंत्र है।
धर्मसार के संबंध में प्रवचन श्रृंखला रामकृष्ण मिशन आश्रम के सचिव ब्रह्मलीन स्वामी आत्मानन्द जी के आग्रह पर प्रस्तुत की गयी थी। उनका यह आग्रह था कि इसे प्रकाशित किया जाना चाहिए। उन्होंने संपादित प्रति मुझे बहुत वर्ष पहले ही दे दी थी। किन्तु अन्य पुस्तकों के प्रकाशन क्रम में यह ग्रंथ विस्मृत-सा हो गया। किन्तु वर्तमान समस्याओं के परिप्रेक्ष्य में जब हम देश, समाज, जाति के विखंडन की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं तब इसकी उपयोगिता बहुत अधिक है, ऐसा मेरा विश्वास है।
यह ग्रन्थ स्वामी जी की स्मृति में समर्पित है। उनके समर्पित व्यक्तित्व के प्रति सबसे बड़ी श्रद्धांजलि और हो भी क्या सकती है।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2022 |
| Pulisher |











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