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Description
कहा सुना
पिछली शताब्दी के आखिरी दशकों में हिंदी कहानी में जिन लेखकों ने सचमुच बड़ी छाप छोड़ी है उनमें स्वयं प्रकाश अव्वल हैं। राजस्थान के छोटे छोटे शहरों-कस्बों से अपने लेखन की शुरुआत कर वे हिंदी जैसी बड़ी भाषा के सिरमौर लेखक बने। अपने लेखन की लंबी अवधि में उन्होंने अनेक यादगार और कालजयी कहानियाँ लिखीं। सूरज कब निकलेगा, अविनाश मोटू उर्फ एक आम आदमी, पार्टिशन, बलि, कहाँ जाओगे बाबा, गौरी का गुस्सा और प्रतीक्षा जैसी कहानियाँ हिंदी की उपलब्धियाँ ही तो हैं।
‘कहा-सुना’ उनके साक्षात्कारों का संकलन है जिसमें कथाकार स्वयं प्रकाश की निर्मिति और महत्त्व को देखा-समझा जा सकता है। आकस्मिक नहीं कि ऐसे कथाकार से न केवल आलोचकों अपितु पाठकों के भी अनेक सवाल हों। इस पुस्तक में उनसे लिए सभी महत्वपूर्ण साक्षात्कारों को एक जगह पढ़ना हिंदी कहानी के लंबे दौर को समझना भी है। यह पुस्तक समान्तर कहानी से जनवादी कहानी का संघर्षशील सफर की गवाही देती है तो इसमें भूमंडलीकरण के बाद हुए बदलावों की वाजिब चिंताओं से उपजे सवाल-जवाब भी हैं। मीडिया, धार्मिक तत्ववाद, विचारधारा और लेखक की अस्मिता से से जुड़े ये सवाल-जवाब किसी विमर्श से कम नहीं।
स्वयं प्रकाश अपनी कहानियों की तरह इनमें भी साफ साफ – दो टूक कहने के कायल हैं। बातों को उलझाकर चोर रास्ते से भाग जाना उनकी फितरत नहीं। ‘कहा-सुना’ हिंदी की एक विरल विधा साक्षात्कार को नया अर्थ देगी इसमें कोई संदेह नहीं।
– डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल
Additional information
| ISBN | |
|---|---|
| Authors | |
| Binding | Hardbound |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2019 |
| Pulisher |











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